Last updated: October 6th, 2026 at 02:16 pm

दिल्ली में मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ चल रहे प्रदर्शन के दौरान तीन महिला पत्रकारों द्वारा दिल्ली पुलिस के अधिकारियों पर कथित यौन उत्पीड़न और बदसलूकी के आरोप लगाए जाने के बाद मामला गंभीर हो गया है। तीनों पत्रकारों की शिकायतों को जांच के लिए क्राइम ब्रांच को सौंप दिया गया है। पुलिस ने कहा है कि मामले की निष्पक्ष जांच की जाएगी और प्रदर्शन स्थल की CCTV फुटेज समेत उपलब्ध अन्य साक्ष्यों की भी जांच की जाएगी।
यह मामला 3 अक्टूबर को नई दिल्ली के जंतर-मंतर के आसपास हुए प्रदर्शन से जुड़ा है। प्रदर्शनकारी मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ नारेबाजी कर रहे थे और मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR को लेकर अपनी आपत्तियां दर्ज करा रहे थे। इसी दौरान पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच स्थिति तनावपूर्ण हो गई थी।
तीन महिला पत्रकारों ने आरोप लगाया कि जब वे प्रदर्शन और पुलिस कार्रवाई को रिकॉर्ड कर रही थीं, तब कुछ पुलिसकर्मियों ने उनके साथ कथित तौर पर अनुचित व्यवहार किया। एक महिला पत्रकार ने एक पुलिस अधिकारी पर गंभीर यौन उत्पीड़न का आरोप लगाया है। दूसरी पत्रकार ने भी प्रदर्शन के दौरान पुलिसकर्मी द्वारा अनुचित तरीके से छूने का आरोप लगाया। तीसरी महिला पत्रकार ने भी पुलिस कार्रवाई के दौरान बदसलूकी और कथित मारपीट की शिकायत की है।
शिकायत सामने आने के बाद दिल्ली पुलिस ने तीनों मामलों को क्राइम ब्रांच को भेज दिया। पुलिस अधिकारियों के अनुसार, शिकायत करने वाली महिलाओं के बयान दर्ज किए गए और उनका मेडिकल परीक्षण भी कराया गया। पुलिस ने लोगों से अपील की है कि यदि किसी के पास प्रदर्शन के दौरान हुई घटनाओं से संबंधित वीडियो या अन्य सबूत हैं तो उन्हें जांच एजेंसी के साथ साझा किया जाए।
मामले में आरोपी बताए जा रहे ACP विवेक भगत के खिलाफ अभी तक FIR दर्ज नहीं होने को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। शिकायतकर्ताओं और उनके समर्थन में प्रदर्शन कर रहे लोगों ने पुलिस से तत्काल FIR दर्ज करने और कार्रवाई करने की मांग की है। सोमवार को शिकायतकर्ता पत्रकार और उनके समर्थन में आए पत्रकारों तथा कार्यकर्ताओं ने संसद मार्ग पुलिस थाने के बाहर विरोध प्रदर्शन भी किया। बाद में उन्हें हिरासत में लिया गया और उन्हें रिहा कर दिया गया।
इस बीच दिल्ली सरकार ने ACP विवेक भगत को दी गई अतिरिक्त जिम्मेदारी को फिलहाल रोक दिया है। उन्हें अतिरिक्त पुलिस उपायुक्त स्तर की अस्थायी जिम्मेदारी दी गई थी, लेकिन आरोपों की जांच पूरी होने तक उन्होंने खुद यह जिम्मेदारी नहीं लेने का अनुरोध किया। इसके बाद सरकार ने आदेश में बदलाव करते हुए उनकी अतिरिक्त जिम्मेदारी रोक दी।
मामले को लेकर राजनीतिक प्रतिक्रिया भी तेज हो गई है। विपक्षी नेताओं और कई सामाजिक संगठनों ने महिला पत्रकारों की शिकायतों पर तुरंत कार्रवाई की मांग की है। उनका कहना है कि प्रदर्शन के दौरान पत्रकारों को अपना काम करने की स्वतंत्रता मिलनी चाहिए और यदि किसी पुलिसकर्मी पर गंभीर आरोप लगाए गए हैं तो उसकी निष्पक्ष जांच जरूरी है।
दूसरी ओर, पुलिस का कहना है कि प्रदर्शन के दौरान कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए कार्रवाई की गई थी। अधिकारियों के मुताबिक नई दिल्ली क्षेत्र में पहले से प्रतिबंधात्मक आदेश लागू थे और प्रदर्शनकारियों को निर्धारित नियमों का पालन करने के लिए कहा गया था। पुलिस ने यह भी कहा है कि महिला पत्रकारों की शिकायतों की जांच अलग से की जा रही है।
इस मामले ने पुलिस कार्रवाई में पारदर्शिता और जवाबदेही को लेकर भी बहस तेज कर दी है। इसी बीच दिल्ली हाई कोर्ट में पुलिसकर्मियों के लिए बॉडी-वॉर्न कैमरों के अनिवार्य इस्तेमाल की मांग को लेकर जनहित याचिका भी दायर की गई है। याचिका में कहा गया है कि प्रदर्शन और भीड़ नियंत्रण के दौरान बॉडी कैमरों की रिकॉर्डिंग से घटनाओं की वास्तविक स्थिति की जांच करने में मदद मिल सकती है।
तीनों महिला पत्रकारों की शिकायतों की जांच क्राइम ब्रांच के पास है। जांच के दौरान शिकायतकर्ताओं के बयान, मेडिकल रिपोर्ट, CCTV फुटेज और उपलब्ध वीडियो रिकॉर्डिंग जैसे साक्ष्यों की जांच की जाएगी। जांच पूरी होने के बाद ही यह स्पष्ट होगा कि आरोपों में कितनी सच्चाई है और संबंधित पुलिसकर्मियों के खिलाफ आगे क्या कार्रवाई की जाएगी।
![]()
Comments are off for this post.