Last updated: October 11th, 2026 at 02:39 pm

दिल्ली में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर हुए विरोध प्रदर्शन के दौरान पुलिस की व्यापक कार्रवाई चर्चा का विषय बन गई है। शनिवार, 10 अक्टूबर 2026 को राजधानी में हजारों लोगों को हिरासत में लिया गया। रविवार को भी प्रदर्शनकारियों के छोटे-छोटे समूहों ने कई स्थानों पर विरोध जारी रखा, जिसके बाद पुलिस ने दोबारा लोगों को हिरासत में लिया। इस कार्रवाई में छात्र संगठनों के सदस्य, राजनीतिक कार्यकर्ता और प्रदर्शन को कवर कर रहे कुछ पत्रकार भी शामिल थे। घटनाक्रम के बीच सुप्रीम कोर्ट ने लोगों की आवाजाही और हिरासत से जुड़े मामलों पर अधिकारियों को जरूरी निर्देश दिए।
प्रदर्शन का आयोजन कॉकroach जनता पार्टी (CJP) और उससे जुड़े छात्र संगठनों तथा नागरिक समूहों की ओर से किया गया था। प्रदर्शनकारी मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग कर रहे थे। उनका आरोप है कि मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर के दौरान बड़ी संख्या में मतदाताओं के नाम हटाए गए और इस प्रक्रिया में पारदर्शिता की कमी रही। प्रदर्शनकारियों ने इसे लोकतांत्रिक अधिकारों से जुड़ा मुद्दा बताया और सरकार तथा चुनाव आयोग से जवाबदेही की मांग की।
हालांकि, भारतीय जनता पार्टी और चुनाव आयोग ने मतदाता सूची में कथित हेरफेर के आरोपों को खारिज किया है। चुनाव आयोग का कहना है कि मतदाता सूची के सत्यापन के दौरान मृत व्यक्तियों, स्थान बदल चुके लोगों और जिनका पता नहीं चल सका, उनसे संबंधित नामों को हटाया गया। इसलिए इस विवाद में लगाए गए आरोपों और आधिकारिक स्पष्टीकरण का आकलन तथ्यों तथा संबंधित रिकॉर्ड के आधार पर किया जाना आवश्यक है।
शनिवार को प्रदर्शन से पहले दिल्ली में सुरक्षा के व्यापक इंतजाम किए गए थे। पुलिस और केंद्रीय सुरक्षा बलों ने राजधानी के कई हिस्सों में बैरिकेड लगाए। जंतर-मंतर और मध्य दिल्ली के आसपास सुरक्षा बढ़ा दी गई, ताकि बड़ी भीड़ एकत्र न हो सके। पुलिस की कार्रवाई के दौरान कई स्थानों पर लोगों को बसों में बैठाकर हिरासत केंद्रों तक ले जाया गया। कुछ जगहों पर प्रदर्शनकारियों ने नारे लगाए और पुलिस के साथ बहस भी हुई।
मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, शनिवार को दिल्ली में लगभग 7,000 लोगों को हिरासत में लिया गया। हालांकि, अलग-अलग रिपोर्टों में हिरासत में लिए गए लोगों की संख्या अलग बताई गई है। पुलिस सूत्रों के हवाले से कुछ रिपोर्टों में कहा गया कि बड़ी संख्या में लोगों को उसी रात रिहा कर दिया गया था। सामान्य प्रदर्शनकारियों के अलावा CJP के प्रमुख नेताओं और कई राजनीतिक व्यक्तियों को भी हिरासत में लिए जाने की खबर सामने आई।
CJP के संस्थापक अभिजीत दीपके और संगठन के दो अन्य वरिष्ठ नेताओं को भी दिल्ली पहुंचने के बाद हिरासत में लिया गया था। बाद में अदालत के आदेश पर उन्हें शांति बनाए रखने की शर्त के साथ रिहा कर दिया गया। रिहाई के बाद नेताओं ने कहा कि वे आंदोलन जारी रखेंगे। उनका कहना है कि हिरासत में लिए जाने से उनकी मांग समाप्त नहीं होगी और वे मतदाता सूची से जुड़े सवालों को उठाते रहेंगे।
रविवार को भी राजधानी में विरोध प्रदर्शन की कोशिशें जारी रहीं। जंतर-मंतर की ओर बढ़ने वाले कई समूहों को पुलिस ने रोक लिया। कुछ स्थानों पर छात्र संगठनों के कार्यकर्ताओं ने नारेबाजी की, जिसके बाद उन्हें हिरासत में लिया गया। मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक, अखिल भारतीय छात्र संघ (AISA), स्टूडेंट्स फेडरेशन ऑफ इंडिया (SFI) और क्रांतिकारी युवा संगठन (KYS) से जुड़े कुछ कार्यकर्ता भी पुलिस कार्रवाई के दायरे में आए। माकपा के राज्यसभा सांसद जॉन ब्रिटास को भी कुछ समय के लिए हिरासत में लिए जाने की खबर सामने आई।
प्रदर्शन को कवर कर रहे पत्रकारों को हिरासत में लिए जाने की खबरों ने भी चिंता बढ़ाई। पत्रकारों और प्रदर्शनकारियों की ओर से आरोप लगाया गया कि कुछ लोगों को बिना किसी स्पष्ट भूमिका के हिरासत में लिया गया। कुछ प्रदर्शनकारियों ने पुलिस पर दुर्व्यवहार और मारपीट के आरोप भी लगाए। इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि सभी मामलों में नहीं हो सकी है। पुलिस की ओर से प्रत्येक शिकायत की जांच और हिरासत की परिस्थितियों को स्पष्ट करना महत्वपूर्ण होगा।
रविवार को सुप्रीम कोर्ट ने मामले की सुनवाई करते हुए अधिकारियों से कहा कि शांतिपूर्ण और निहत्थे प्रदर्शनकारियों को कानून में निर्धारित प्रक्रिया का पालन किए बिना हिरासत में नहीं लिया जाना चाहिए। अदालत ने लोगों की आवाजाही सुगम बनाने और सार्वजनिक परिवहन को सामान्य रखने पर भी जोर दिया। सरकार की ओर से अदालत को बताया गया कि मेट्रो सेवाएं बहाल कर दी गई हैं और मोबाइल इंटरनेट सेवाएं भी सामान्य कर दी गई हैं। अदालत ने वकीलों और पत्रकारों को अपने पेशेवर दायित्व निभाने में बाधा नहीं आने देने की बात भी दर्ज की।
इस पूरे घटनाक्रम ने विरोध प्रदर्शन के अधिकार और कानून-व्यवस्था बनाए रखने की जिम्मेदारी के बीच संतुलन पर सवाल खड़े किए हैं। प्रशासन को सुरक्षा संबंधी खतरे की स्थिति में उचित कदम उठाने का अधिकार है, लेकिन कार्रवाई कानूनी प्रक्रिया के अनुरूप होनी चाहिए। इसी तरह, प्रदर्शनकारियों की जिम्मेदारी भी शांतिपूर्ण तरीके से अपनी मांगें रखने की है।
दिल्ली में सुरक्षा व्यवस्था कड़ी बनी हुई है और विरोध प्रदर्शन के दूसरे दिन भी हिरासत की घटनाएं सामने आई हैं। आगे यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि पुलिस की कार्रवाई को लेकर उठे सवालों पर क्या जवाब दिया जाता है और सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों का पालन किस तरह सुनिश्चित किया जाता है। मतदाता सूची से जुड़े विवाद का समाधान भी पारदर्शी प्रक्रिया, उपलब्ध आंकड़ों और उचित संस्थागत जवाबदेही के माध्यम से ही संभव है।
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