Last updated: October 9th, 2026 at 03:34 pm

बिहार में पंचायत चुनाव समय पर होने की संभावना कमजोर पड़ गई है। राज्य सरकार ने अदालत में स्वीकार किया है कि परिसीमन, आरक्षण निर्धारण और अत्यंत पिछड़ा वर्ग (EBC) के लिए जरूरी ट्रिपल टेस्ट की प्रक्रिया पूरी करने में समय लग रहा है। इसके कारण दिसंबर 2026 से जनवरी 2027 के शुरुआती दिनों के बीच समाप्त होने वाले पंचायतों और ग्राम कचहरियों के मौजूदा कार्यकाल से पहले चुनाव कराना मुश्किल नजर आ रहा है। इस स्थिति ने गांवों में चुनाव की तैयारी कर रहे संभावित उम्मीदवारों और मौजूदा पंचायत प्रतिनिधियों की चिंता बढ़ा दी है।
यह मामला पंचायत चुनाव समय पर कराने की मांग से जुड़ी याचिका की सुनवाई के दौरान सामने आया। पांच अक्टूबर को पटना हाई कोर्ट में हुई सुनवाई में सरकार की ओर से चुनाव की तैयारियों में आ रही बाधाओं का उल्लेख किया गया। मामले की अगली सुनवाई 26 नवंबर को निर्धारित बताई गई है। मौजूदा तैयारियों को देखते हुए चुनाव कार्यक्रम तय करने में देरी की आशंका बढ़ गई है। हालांकि, चुनाव की अंतिम तारीख और आगे की व्यवस्था के संबंध में स्थिति संबंधित सरकारी और न्यायिक निर्णयों पर निर्भर करेगी।
बिहार में पंचायत चुनाव से पहले सबसे महत्वपूर्ण चुनौती अत्यंत पिछड़ा वर्ग के लिए आरक्षण का निर्धारण है। सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देशों के अनुसार, स्थानीय निकायों में पिछड़े वर्गों को राजनीतिक प्रतिनिधित्व के लिए आरक्षण देने से पहले उनकी स्थिति का उचित अध्ययन करना आवश्यक है। इसी प्रक्रिया को ट्रिपल टेस्ट कहा जाता है। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि आरक्षण का निर्धारण आंकड़ों और स्थानीय निकायों में संबंधित वर्गों के प्रतिनिधित्व की वास्तविक स्थिति के आधार पर किया जाए।
ट्रिपल टेस्ट की प्रक्रिया में पिछड़ेपन का अध्ययन करने के लिए एक समर्पित आयोग का गठन, प्रत्येक स्थानीय निकाय में आरक्षण का उचित अनुपात तय करना और आरक्षण की कुल सीमा निर्धारित कानूनी मानकों के अनुरूप रखना शामिल है। इस प्रक्रिया को पूरा किए बिना आरक्षण लागू करने पर कानूनी विवाद खड़े हो सकते हैं। इसलिए सरकार के लिए चुनाव से पहले जरूरी अध्ययन और सिफारिशों को पूरा करना महत्वपूर्ण हो गया है।
इस काम के लिए बिहार सरकार ने एएन सिन्हा सामाजिक अध्ययन संस्थान को जिम्मेदारी देने का निर्णय लिया है। संस्थान के विशेषज्ञों की मदद से पंचायत स्तर पर अत्यंत पिछड़ा वर्ग की सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक स्थिति का अध्ययन किया जाना है। इस अध्ययन के आधार पर रिपोर्ट तैयार होगी, जिससे आरक्षण के अनुपात और प्रतिनिधित्व से जुड़े निर्णय लेने में मदद मिलेगी। इसके साथ ही अत्यंत पिछड़ा वर्ग आयोग भी जिलों का दौरा कर स्थिति का आकलन कर रहा है।
आरक्षण की प्रक्रिया पूरी होने के बाद भी चुनाव कराने के लिए कई अन्य प्रशासनिक कार्य बाकी रहेंगे। इनमें पंचायत क्षेत्रों का परिसीमन, विभिन्न पदों के लिए आरक्षण रोस्टर तैयार करना, मतदाता सूची का निर्धारण और मतदान केंद्रों की व्यवस्था शामिल है। परिसीमन के दौरान पंचायतों तथा निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं का पुनर्निर्धारण किया जाता है, ताकि चुनाव नए निर्धारित क्षेत्रों के अनुसार कराए जा सकें। इन प्रक्रियाओं में देरी होने से चुनाव की पूरी समय-सारणी प्रभावित हो सकती है।
बिहार की त्रिस्तरीय पंचायत व्यवस्था में मुखिया, ग्राम पंचायत सदस्य, सरपंच, पंच, पंचायत समिति सदस्य और जिला परिषद सदस्य जैसे पद शामिल हैं। राज्य में हजारों पंचायतों और ग्राम कचहरियों के प्रतिनिधियों का चुनाव होना है। ऐसे में चुनाव की तैयारी एक बड़े प्रशासनिक अभियान के समान है, जिसके लिए मतदाता सूची से लेकर आरक्षण और मतदान व्यवस्था तक सभी चरणों को समय पर पूरा करना जरूरी है।
पंचायत चुनाव में देरी का असर ग्रामीण प्रशासन पर भी पड़ सकता है। पंचायत प्रतिनिधियों के कार्यकाल समाप्त होने के बाद स्थानीय विकास योजनाओं, ग्राम स्तर पर निर्णय लेने और प्रशासनिक जिम्मेदारियों के संचालन को लेकर सवाल उठ सकते हैं। हालांकि, ऐसी स्थिति में वैकल्पिक व्यवस्था क्या होगी, यह सरकार और संबंधित प्राधिकरणों के निर्णय से स्पष्ट होगा।
राजनीतिक रूप से भी पंचायत चुनाव बिहार के ग्रामीण क्षेत्रों में महत्वपूर्ण माने जाते हैं। बड़ी संख्या में स्थानीय उम्मीदवार चुनाव की तैयारी करते हैं और गांवों में विकास, सड़क, पेयजल, स्वच्छता तथा अन्य सुविधाओं से जुड़े मुद्दे प्रमुख रहते हैं। चुनाव में देरी होने पर उम्मीदवारों और मतदाताओं को कार्यक्रम स्पष्ट होने का इंतजार करना पड़ेगा।
सबसे बड़ी चुनौती परिसीमन और आरक्षण की कानूनी प्रक्रिया को समय पर पूरा करना है। सरकार और राज्य निर्वाचन आयोग के सामने यह सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी है कि चुनाव संवैधानिक प्रावधानों तथा न्यायालय के निर्देशों के अनुरूप हों। अगली सुनवाई और प्रशासनिक तैयारियों के बाद ही बिहार पंचायत चुनाव की समय-सारणी को लेकर अधिक स्पष्ट तस्वीर सामने आने की उम्मीद है।
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