Last updated: October 19th, 2026 at 06:35 am

बिहार में नियोजित और अप्रशिक्षित शिक्षकों की सेवा सुरक्षा का मामला एक बार फिर चर्चा में आ गया है। राष्ट्रीय जनता दल (राजद) के नेता और बिहार विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव ने मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी को पत्र लिखकर प्रभावित शिक्षकों की नौकरी बचाने के लिए तत्काल कदम उठाने की मांग की है। उन्होंने सरकार से सुप्रीम कोर्ट में पुनर्विचार याचिका दाखिल करने और शिक्षकों के हितों की रक्षा के लिए प्रभावी कानूनी पैरवी करने का आग्रह किया है।
तेजस्वी यादव ने 17 अक्टूबर 2026 को लिखे अपने पत्र में कहा कि सुप्रीम कोर्ट के जुलाई 2026 के आदेश के बाद वर्ष 2015 के बाद नियुक्त अप्रशिक्षित शिक्षकों की सेवा को लेकर चिंता बढ़ गई है। इस स्थिति का असर वर्ष 2015-16 में नियुक्त उर्दू और बांग्ला विशेष शिक्षकों पर भी पड़ने की आशंका है। उनके अनुसार, लंबे समय से सरकारी विद्यालयों में सेवाएं दे रहे शिक्षकों और उनके परिवारों के सामने भविष्य को लेकर अनिश्चितता पैदा हो गई है।
तेजस्वी ने मुख्यमंत्री से आग्रह किया कि राज्य सरकार इस मामले को गंभीरता से लेते हुए अदालत के सामने सभी संबंधित तथ्यों को रखे। उनका कहना है कि शिक्षकों की नियुक्ति प्रक्रिया, प्रशिक्षण, योग्यता और अब तक की सेवा अवधि पर विचार किए बिना कोई ऐसा कदम नहीं उठाया जाना चाहिए, जिससे उनकी आजीविका पर अचानक संकट आ जाए।
उर्दू और बांग्ला विशेष शिक्षकों के लिए अलग से राहत की मांग
तेजस्वी यादव ने अपने पत्र में उर्दू और बांग्ला विशेष शिक्षकों की नियुक्ति प्रक्रिया का भी उल्लेख किया। उनका तर्क है कि इन शिक्षकों का नियोजन किसी नई प्रक्रिया के तहत नहीं, बल्कि वर्ष 2014 में शुरू हुई नियुक्ति प्रक्रिया की निरंतरता में हुआ था। नियुक्तियां बाद में विभागीय निर्देशों और न्यायिक आदेशों के अनुपालन में की गई थीं।
ऐसे में केवल नियुक्ति की तारीख 31 मार्च 2015 के बाद होने के आधार पर इन शिक्षकों को सेवा समाप्ति के संभावित दायरे में रखना उचित नहीं होगा। उन्होंने सरकार से संबंधित नियुक्तियों की परिस्थितियों और दस्तावेजों की समीक्षा कर प्रभावित शिक्षकों को राहत देने की मांग की।
राजद नेता ने यह भी कहा कि कई शिक्षक नियुक्ति के बाद आवश्यक प्रशिक्षण पूरा कर चुके हैं और सक्षमता परीक्षा भी उत्तीर्ण कर चुके हैं। कुछ शिक्षक आगे की भर्ती प्रक्रियाओं के माध्यम से विशिष्ट शिक्षक, प्रधान शिक्षक या विद्यालय अध्यापक जैसे पदों पर कार्यरत हैं। ऐसे मामलों में उनकी वर्तमान योग्यता और सेवा की स्थिति को ध्यान में रखकर निर्णय लिया जाना चाहिए।
वेतन रोकने और सेवा समाप्ति की कार्रवाई पर रोक लगाने का आग्रह
तेजस्वी यादव ने मुख्यमंत्री से मांग की कि कानूनी स्थिति स्पष्ट होने तक प्रभावित शिक्षकों के विरुद्ध सेवा समाप्त करने, बर्खास्तगी या वेतन रोकने जैसी कार्रवाई से बचने के लिए संबंधित विभागों और जिलों को स्पष्ट निर्देश दिए जाएं। उन्होंने जरूरत पड़ने पर नियमों में संशोधन अथवा अन्य वैधानिक उपाय अपनाने का भी सुझाव दिया।
पत्र में नियोजन से जुड़े दस्तावेजों और मेधा सूचियों की उपलब्धता का मुद्दा भी उठाया गया। तेजस्वी का कहना है कि यदि किसी शिक्षक की नियुक्ति से संबंधित अभिलेख गायब हैं या उनमें प्रशासनिक स्तर पर गड़बड़ी हुई है, तो इसकी जिम्मेदारी संबंधित नियोजन इकाइयों और अधिकारियों की तय की जानी चाहिए। उन्होंने कहा कि प्रशासनिक लापरवाही का खामियाजा शिक्षकों और उनके परिवारों को भुगतना नहीं पड़ना चाहिए।
सरकार की अगली कार्रवाई पर नजर
इस मुद्दे पर तेजस्वी यादव की मांग के बाद बिहार में शिक्षकों की सेवा सुरक्षा को लेकर राजनीतिक बहस तेज हो गई है। विपक्ष का जोर है कि सरकार प्रभावित शिक्षकों के हितों की रक्षा के लिए कानूनी विकल्पों पर तत्काल विचार करे और वर्षों से काम कर रहे कर्मचारियों को अनिश्चितता में न छोड़े।
हालांकि, सुप्रीम कोर्ट के आदेश का अलग-अलग शिक्षकों पर वास्तविक प्रभाव संबंधित आदेश, नियुक्ति की परिस्थितियों और लागू नियमों पर निर्भर करेगा। तेजस्वी यादव की ओर से पुनर्विचार याचिका दाखिल करने की मांग की गई है, लेकिन पत्र लिखे जाने भर से यह नहीं माना जा सकता कि सरकार ने याचिका दाखिल कर दी है या सभी शिक्षकों की नौकरी समाप्त होने का फैसला हो चुका है।
शिक्षकों और उनके परिवारों की निगाहें राज्य सरकार के अगले कदम पर टिकी हैं। यदि सरकार कानूनी स्तर पर हस्तक्षेप करती है, तो प्रभावित शिक्षकों को राहत मिलने की संभावना पर आगे स्थिति स्पष्ट हो सकती है। इस मामले में अंतिम फैसला संबंधित न्यायिक आदेशों और सरकार की कार्रवाई के आधार पर ही तय होगा।
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