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यूपी में विधानसभा और पंचायत वोटर लिस्ट के अंतर पर हाईकोर्ट सख्त, सरकार से मांगा जवाब

  उत्तर प्रदेश में विधानसभा और पंचायत चुनावों की मतदाता सूचियों में सामने आ रहे अंतर को लेकर इलाहाबाद हाईकोर्ट
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    उत्तर प्रदेश में विधानसभा और पंचायत चुनावों की मतदाता सूचियों में सामने आ रहे अंतर को लेकर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सख्त रुख अपनाया है। अदालत ने राज्य सरकार और उत्तर प्रदेश राज्य निर्वाचन आयोग से इस मामले में जवाब मांगा है। याचिका में दावा किया गया है कि कई ऐसे लोगों के नाम पंचायत की मतदाता सूची में नहीं हैं, जो विधानसभा चुनाव की मतदाता सूची में दर्ज हैं और मतदान भी कर चुके हैं।

     

    मामला इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि उत्तर प्रदेश में विधानसभा और पंचायत चुनावों के लिए अलग-अलग मतदाता सूची तैयार करने की व्यवस्था है। विधानसभा और लोकसभा चुनावों की मतदाता सूची भारत निर्वाचन आयोग के स्तर पर तैयार होती है, जबकि ग्राम प्रधान, क्षेत्र पंचायत और जिला पंचायत चुनावों के लिए मतदाता सूची राज्य निर्वाचन आयोग के माध्यम से तैयार की जाती है। इसी अलग व्यवस्था के कारण दोनों सूचियों में नामों को लेकर अंतर सामने आने की शिकायतें लगातार उठती रही हैं।

     

    याचिका में इसी व्यवस्था पर सवाल उठाते हुए कहा गया कि कई पात्र मतदाताओं के नाम एक चुनावी सूची में मौजूद हैं, लेकिन दूसरी सूची में दिखाई नहीं देते। इससे ग्रामीण क्षेत्रों में लोगों के मतदान के अधिकार को लेकर परेशानी पैदा हो सकती है। अदालत ने संबंधित अधिकारियों से यह स्पष्ट करने को कहा है कि दोनों मतदाता सूचियों के बीच समन्वय किस तरह किया जाता है और पात्र मतदाताओं के नाम अलग-अलग सूचियों में छूटने की स्थिति क्यों बनती है।

     

    हाईकोर्ट ने राज्य के पंचायती राज विभाग, मुख्य निर्वाचन अधिकारी और राज्य निर्वाचन आयोग से इस मामले में जवाब दाखिल करने को कहा है। अधिकारियों को करीब चार सप्ताह का समय दिया गया है। अदालत के सामने अब यह स्पष्ट करना होगा कि विधानसभा और पंचायत चुनावों की अलग-अलग मतदाता सूचियों को तैयार करने और अपडेट करने की प्रक्रिया क्या है तथा इनमें होने वाली विसंगतियों को दूर करने के लिए क्या व्यवस्था मौजूद है।

     

    यह मामला ऐसे समय सामने आया है जब उत्तर प्रदेश में पंचायत चुनावों की तैयारियां भी महत्वपूर्ण चरण में हैं। पंचायत चुनावों में ग्राम प्रधान, क्षेत्र पंचायत और जिला पंचायत स्तर पर मतदान होता है। ऐसे में मतदाता सूची में किसी पात्र व्यक्ति का नाम नहीं होना उसके मतदान के अधिकार को सीधे प्रभावित कर सकता है। दूसरी ओर, गलत या अपात्र नामों को सूची में शामिल किए जाने की शिकायतें भी चुनाव प्रक्रिया की पारदर्शिता पर सवाल खड़े कर सकती हैं।

     

    हाल के महीनों में उत्तर प्रदेश में मतदाता सूची को लेकर कई अलग-अलग मामले अदालतों तक पहुंचे हैं। सितंबर में इलाहाबाद हाईकोर्ट के लखनऊ बेंच के सामने भी एक मामला आया था, जिसमें एक व्यक्ति ने शिकायत की थी कि 2025 तक उसका नाम मतदाता सूची में था, लेकिन 2026 की पंचायत मतदाता सूची में उसका नाम नहीं था। अदालत ने संबंधित नियमों के तहत उचित प्राधिकारी के सामने आवेदन करने का रास्ता बताया था।

     

    वहीं राज्य निर्वाचन आयोग की वेबसाइट पर 2026 की अंतिम पंचायत मतदाता सूची उपलब्ध कराई गई है। मतदाता जिला, विकासखंड और ग्राम पंचायत का चयन करके सूची देख सकते हैं। इससे ऐसे मतदाताओं को अपने नाम की स्थिति जांचने का अवसर मिलता है, जिन्हें पंचायत चुनाव की सूची में नाम को लेकर कोई आशंका है।

     

    इस पूरे विवाद का एक बड़ा सवाल यह भी है कि क्या भविष्य में विधानसभा और पंचायत चुनावों के लिए एक समान या अधिक समन्वित मतदाता डेटाबेस तैयार किया जा सकता है। इससे नामों के दोहराव, गलत नामों और पात्र मतदाताओं के नाम छूटने जैसी समस्याओं को कम किया जा सकता है। हालांकि इसके लिए कानूनी और प्रशासनिक स्तर पर बड़े बदलाव की आवश्यकता होगी।

     

    हाईकोर्ट के निर्देश के बाद राज्य सरकार और राज्य निर्वाचन आयोग की ओर से दिए जाने वाले जवाब पर नजर रहेगी। अदालत के सामने पेश होने वाली जानकारी से यह स्पष्ट हो सकता है कि दोनों मतदाता सूचियों में अंतर क्यों है और पात्र मतदाताओं के नामों को लेकर शिकायतों के समाधान के लिए मौजूदा व्यवस्था कितनी प्रभावी है।

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