Last updated: July 5th, 2026 at 03:26 pm

केंद्र सरकार वित्त वर्ष 2026-27 में पूंजीगत व्यय (Capital Expenditure) को आर्थिक विकास का प्रमुख आधार बनाए हुए है। सरकार का मानना है कि सड़क, रेलवे, बंदरगाह, हवाई अड्डों, ऊर्जा, शहरी बुनियादी ढांचे और लॉजिस्टिक्स में बड़े निवेश से न केवल देश की आर्थिक गतिविधियों को गति मिलेगी, बल्कि निजी निवेश और रोजगार सृजन को भी बढ़ावा मिलेगा। हाल के महीनों में विभिन्न मंत्रालयों द्वारा आधारभूत संरचना परियोजनाओं की समीक्षा और तेज़ी से क्रियान्वयन पर विशेष जोर दिया गया है।
सरकार के अनुसार, पूंजीगत व्यय में वृद्धि का उद्देश्य केवल नई परियोजनाओं की घोषणा करना नहीं, बल्कि पहले से स्वीकृत परियोजनाओं को समयबद्ध तरीके से पूरा करना भी है। इसके लिए सड़क परिवहन, रेलवे, आवास एवं शहरी कार्य, ऊर्जा और जल संसाधन जैसे प्रमुख मंत्रालयों को परियोजनाओं की नियमित निगरानी के निर्देश दिए गए हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि समय पर परियोजनाएं पूरी होने से निवेशकों का विश्वास भी मजबूत होगा।
आर्थिक जानकारों के अनुसार, इंफ्रास्ट्रक्चर पर सरकारी खर्च का सीधा प्रभाव कई उद्योगों पर पड़ता है। सड़क और रेलवे निर्माण बढ़ने से इस्पात, सीमेंट, मशीनरी और निर्माण सामग्री की मांग बढ़ती है। इसके साथ ही परिवहन लागत कम होने से उद्योगों की प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता में सुधार होता है और व्यापार को नई गति मिलती है।
सरकार की पीएम गति शक्ति, राष्ट्रीय अवसंरचना पाइपलाइन (NIP) और मल्टी-मॉडल कनेक्टिविटी जैसी योजनाओं को भी इसी रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है। इन योजनाओं का उद्देश्य विभिन्न परिवहन नेटवर्क और औद्योगिक क्षेत्रों को बेहतर ढंग से जोड़ना है ताकि लॉजिस्टिक्स लागत कम हो और उत्पादन क्षमता बढ़ सके।
विशेषज्ञों का कहना है कि भारत की तेज़ आर्थिक वृद्धि बनाए रखने के लिए सार्वजनिक निवेश की महत्वपूर्ण भूमिका है। निजी क्षेत्र अक्सर तब बड़े निवेश करता है जब उसे बेहतर बुनियादी ढांचा, स्थिर नीतियां और मजबूत मांग दिखाई देती है। ऐसे में सरकार का पूंजीगत व्यय निजी निवेश को भी प्रोत्साहित करने का माध्यम बन सकता है।
रोजगार के दृष्टिकोण से भी इंफ्रास्ट्रक्चर निवेश को महत्वपूर्ण माना जा रहा है। बड़ी परियोजनाओं में निर्माण, इंजीनियरिंग, परिवहन और संबंधित सेवाओं में लाखों प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रोजगार के अवसर पैदा होते हैं। इसके अलावा परियोजनाएं पूरी होने के बाद उद्योगों और सेवा क्षेत्र के विस्तार से भी दीर्घकालिक रोजगार सृजित होने की संभावना रहती है।
हालांकि आर्थिक विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि केवल बजट आवंटन पर्याप्त नहीं है। परियोजनाओं का समय पर क्रियान्वयन, भूमि अधिग्रहण, पर्यावरणीय स्वीकृतियां और वित्तीय अनुशासन भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं। यदि इन चुनौतियों का प्रभावी समाधान किया जाता है, तो पूंजीगत व्यय का आर्थिक लाभ और अधिक बढ़ सकता है।
विश्लेषकों का मानना है कि वैश्विक आर्थिक अनिश्चितताओं के बीच भारत की मजबूत घरेलू मांग और इंफ्रास्ट्रक्चर आधारित विकास रणनीति देश को अपेक्षाकृत बेहतर स्थिति में रख सकती है। आने वाले वर्षों में यदि सार्वजनिक और निजी निवेश दोनों समान गति से बढ़ते हैं, तो भारत दुनिया की सबसे तेज़ी से बढ़ती प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में अपनी स्थिति और मजबूत कर सकता है।
केंद्र सरकार का फोकस स्पष्ट रूप से इंफ्रास्ट्रक्चर विकास, पूंजीगत निवेश और आर्थिक गतिविधियों को गति देने पर है। विशेषज्ञों का मानना है कि यही रणनीति भारत के “विकसित भारत 2047” के लक्ष्य को हासिल करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी।
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