Last updated: August 26th, 2026 at 11:12 am

हिजाब को लेकर इलाहाबाद हाई कोर्ट के हालिया फैसले के बाद राजनीतिक बयानबाजी तेज हो गई है। AIMIM के राष्ट्रीय प्रवक्ता वारिस पठान ने कोर्ट के फैसले पर असहमति जताते हुए धार्मिक स्वतंत्रता और व्यक्ति की पसंद के अधिकार का मुद्दा उठाया है। उन्होंने कहा कि किसी व्यक्ति को अपनी धार्मिक मान्यताओं के अनुसार पहनावा चुनने से रोकना उचित नहीं है।
वारिस पठान ने कहा कि भारतीय संविधान नागरिकों को अपने धर्म का पालन करने की स्वतंत्रता देता है। उनके मुताबिक, अगर कोई महिला या लड़की अपनी इच्छा से हिजाब पहनना चाहती है, तो उसके फैसले पर सवाल उठाना उचित नहीं होना चाहिए। उन्होंने पहनावे के आधार पर किसी की धार्मिक आस्था को निर्धारित किए जाने पर भी आपत्ति जताई।
‘धार्मिक आजादी पर नहीं होना चाहिए हस्तक्षेप’
AIMIM नेता ने कहा कि संविधान में धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार दिया गया है और इसी आधार पर हर व्यक्ति को अपनी आस्था के अनुरूप जीवन जीने का अधिकार मिलना चाहिए। उन्होंने दावा किया कि हिजाब को लेकर अदालत की टिप्पणी धार्मिक मामलों में हस्तक्षेप जैसी स्थिति पैदा करती है।
पठान ने यह भी कहा कि अलग-अलग समुदायों के लोग अपनी धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान के अनुरूप पहनावा अपनाते हैं। उन्होंने हिंदू महिलाओं के मंगलसूत्र और सिंदूर तथा सिख समुदाय की पगड़ी का उदाहरण देते हुए कहा कि धार्मिक प्रतीकों को लेकर सभी के लिए समान दृष्टिकोण होना चाहिए।
हाई कोर्ट के फैसले पर क्यों उठा विवाद?
दरअसल, मामला एक छात्रा की याचिका से जुड़ा है, जिसमें स्कूल में हिजाब पहनने की अनुमति मांगी गई थी। याचिका पर सुनवाई करते हुए इलाहाबाद हाई कोर्ट ने उसे खारिज कर दिया। अदालत ने अपने फैसले में विभिन्न न्यायिक फैसलों का उल्लेख करते हुए कहा कि हिजाब को इस्लाम का अनिवार्य धार्मिक हिस्सा नहीं माना जा सकता।
कोर्ट के इसी रुख पर वारिस पठान ने सवाल उठाते हुए कहा कि धार्मिक आस्था और उसके पालन से जुड़े मामलों में व्यक्ति की पसंद और संवैधानिक अधिकारों का सम्मान किया जाना चाहिए।
पहनावे की आजादी को लेकर बहस तेज
इस मामले के बाद हिजाब, धार्मिक स्वतंत्रता और शैक्षणिक संस्थानों में ड्रेस कोड को लेकर बहस एक बार फिर चर्चा में आ गई है। एक ओर अदालत का फैसला है, वहीं दूसरी ओर वारिस पठान जैसे नेताओं का तर्क है कि धार्मिक पहचान से जुड़े पहनावे को व्यक्ति की स्वतंत्रता के दायरे में देखा जाना चाहिए। अब इस मुद्दे पर आगे होने वाली कानूनी और राजनीतिक चर्चा पर नजर रहेगी।
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