Last updated: August 30th, 2026 at 02:48 pm

लखनऊ: उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में ई-रिक्शा की बढ़ती संख्या और उससे पैदा हो रही यातायात समस्याओं को लेकर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने गंभीर चिंता जताई है। अदालत ने मामले की सुनवाई के दौरान राज्य सरकार को ई-रिक्शा के संचालन, पंजीकरण और यातायात प्रबंधन को लेकर एक प्रभावी नीति तैयार करने पर विचार करने का निर्देश दिया है। अदालत का कहना है कि बिना उचित नियमन के बढ़ती संख्या शहर की यातायात व्यवस्था पर अतिरिक्त दबाव डाल सकती है।
लखनऊ में पिछले कुछ वर्षों में ई-रिक्शा की संख्या तेजी से बढ़ी है। शहर के कई प्रमुख मार्गों, बाजारों और भीड़भाड़ वाले इलाकों में ई-रिक्शा स्थानीय परिवहन का महत्वपूर्ण साधन बन चुके हैं। कम दूरी की यात्रा के लिए इनकी उपलब्धता और अपेक्षाकृत कम किराया होने के कारण बड़ी संख्या में लोग इनका इस्तेमाल करते हैं।
हालांकि ई-रिक्शा की बढ़ती संख्या के साथ ट्रैफिक जाम और सड़क सुरक्षा से जुड़ी समस्याएं भी सामने आती रही हैं। कई प्रमुख सड़कों पर ई-रिक्शा के अनियंत्रित संचालन से वाहनों की गति प्रभावित होने और यातायात बाधित होने की शिकायतें आती रही हैं। अदालत ने इसी व्यापक समस्या को ध्यान में रखते हुए प्रशासनिक व्यवस्था को व्यवस्थित करने की जरूरत पर जोर दिया।
सुनवाई के दौरान अदालत के सामने यह मुद्दा आया कि शहर में ई-रिक्शा का संचालन किस तरह नियंत्रित किया जाए। पंजीकरण, रूट निर्धारण, पार्किंग, यातायात नियमों का पालन और चालक प्रशिक्षण जैसे विषय किसी भी प्रभावी नीति का हिस्सा हो सकते हैं।
ई-रिक्शा के पक्ष में सबसे बड़ा तर्क यह है कि ये कम दूरी की यात्रा के लिए सस्ता और आसानी से उपलब्ध परिवहन विकल्प हैं। खासकर ऐसे इलाकों में जहां सार्वजनिक परिवहन की पहुंच सीमित है, वहां ई-रिक्शा यात्रियों को मुख्य सड़कों, बाजारों और बस या रेलवे स्टेशनों तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
लेकिन दूसरी ओर, यदि बड़ी संख्या में ई-रिक्शा एक ही मार्ग पर चलें और उनके लिए निर्धारित रूट या स्टैंड न हों तो यातायात व्यवस्था प्रभावित हो सकती है। कई बार सड़क किनारे यात्रियों को उतारने या बैठाने के कारण पीछे चल रहे वाहनों की गति भी रुक जाती है।
अदालत की चिंता केवल ट्रैफिक जाम तक सीमित नहीं है। सड़क सुरक्षा भी महत्वपूर्ण मुद्दा है। ई-रिक्शा चालकों के प्रशिक्षण, यातायात नियमों के पालन और वाहन की तकनीकी स्थिति की नियमित जांच से दुर्घटनाओं के जोखिम को कम किया जा सकता है।
राज्य सरकार और स्थानीय प्रशासन के सामने चुनौती यह होगी कि ई-रिक्शा को पूरी तरह प्रतिबंधित करने के बजाय उनके संचालन को व्यवस्थित किया जाए। इससे एक ओर यात्रियों को सस्ता परिवहन मिलता रहेगा, वहीं दूसरी ओर मुख्य सड़कों पर यातायात दबाव को नियंत्रित किया जा सकेगा।
नीति तैयार करते समय अलग-अलग इलाकों की जरूरतों को भी ध्यान में रखना जरूरी होगा। पुराने लखनऊ के भीड़भाड़ वाले बाजारों, प्रमुख चौराहों और संकरी सड़कों की परिस्थितियां शहर के बाहरी इलाकों से अलग हैं। इसलिए एक समान व्यवस्था के बजाय क्षेत्र के हिसाब से रूट और स्टैंड तय किए जा सकते हैं।
ई-रिक्शा चालकों के लिए निर्धारित स्टैंड बनाए जाने से सड़क के बीच या मुख्य मार्गों पर वाहन खड़ा करने की समस्या कम हो सकती है। इसी तरह व्यस्त मार्गों पर समय या रूट आधारित प्रतिबंध लागू करने से यातायात का दबाव कम करने में मदद मिल सकती है।
ई-रिक्शा की संख्या को नियंत्रित करने के लिए पंजीकरण व्यवस्था को भी प्रभावी बनाना जरूरी होगा। प्रशासन को यह सुनिश्चित करना होगा कि केवल वैध रूप से पंजीकृत और निर्धारित सुरक्षा मानकों को पूरा करने वाले वाहन ही सड़कों पर संचालित हों।
इसके अलावा चालकों के लिए यातायात नियमों, यात्रियों की सुरक्षा और सड़क अनुशासन से जुड़े प्रशिक्षण को अनिवार्य किया जा सकता है। नियमित अभियान चलाकर हेलमेट, सीटिंग क्षमता, पार्किंग और अन्य नियमों के पालन की जांच भी की जा सकती है।
हाईकोर्ट की टिप्पणी के बाद अब राज्य सरकार और संबंधित स्थानीय निकायों की भूमिका महत्वपूर्ण हो गई है। यदि एक स्पष्ट नीति तैयार होती है तो इससे ई-रिक्शा चालकों, यात्रियों और दूसरे वाहन चालकों के बीच नियमों को लेकर स्पष्टता आएगी।
हालांकि इस मुद्दे पर नीति बनाते समय ई-रिक्शा चालकों की आजीविका को भी ध्यान में रखना होगा। बड़ी संख्या में लोग ई-रिक्शा चलाकर अपने परिवार का भरण-पोषण करते हैं। इसलिए किसी भी नई व्यवस्था में अचानक प्रतिबंध लगाने के बजाय चरणबद्ध और व्यावहारिक समाधान पर जोर देना जरूरी होगा।
लखनऊ जैसे तेजी से बढ़ते शहर में सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था को मजबूत करना भी इस समस्या का दीर्घकालिक समाधान हो सकता है। मेट्रो, सिटी बस और अन्य सार्वजनिक परिवहन सेवाओं को ई-रिक्शा के साथ बेहतर तरीके से जोड़ने से यात्रियों को अंतिम छोर तक पहुंचने की सुविधा मिल सकती है।
इस तरह ई-रिक्शा को समस्या के बजाय सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था के एक हिस्से के रूप में व्यवस्थित किया जा सकता है। इसके लिए रूट, स्टैंड, पंजीकरण, चालक प्रशिक्षण और यातायात प्रवर्तन को एक ही नीति के तहत लाने की आवश्यकता होगी।
हाईकोर्ट की टिप्पणी के बाद सरकार के सामने ई-रिक्शा संचालन को लेकर स्पष्ट और प्रभावी व्यवस्था तैयार करने की चुनौती है। आने वाले समय में सरकार की ओर से बनाई जाने वाली नीति यह तय करेगी कि लखनऊ में ई-रिक्शा की बढ़ती संख्या को किस तरह नियंत्रित किया जाता है और यात्रियों की सुविधा तथा सड़क सुरक्षा के बीच संतुलन कैसे बनाया जाता है।
लखनऊ में ई-रिक्शा की बढ़ती संख्या और यातायात व्यवस्था पर पड़ रहे असर को लेकर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने चिंता जताई है। अदालत ने राज्य सरकार से ई-रिक्शा के संचालन को व्यवस्थित करने के लिए प्रभावी नीति बनाने की दिशा में कदम उठाने को कहा है। रूट निर्धारण, पंजीकरण, पार्किंग, चालक प्रशिक्षण और सड़क सुरक्षा जैसे मुद्दे इस व्यवस्था के महत्वपूर्ण हिस्से हो सकते हैं।
![]()
Comments are off for this post.