Last updated: September 17th, 2026 at 02:39 pm

बिहार में बच्चों के लापता होने से जुड़ा एक गंभीर आंकड़ा सामने आने के बाद पटना हाईकोर्ट ने मामले पर चिंता जताई है। अदालत को बताया गया कि राज्य में करीब 14,500 बच्चे लापता हैं। यह जानकारी नालंदा के एक अस्पताल से नवजात बच्चे के गायब होने से जुड़े मामले की सुनवाई के दौरान सामने आई। अदालत ने बच्चों की सुरक्षा और लापता बच्चों की तलाश से जुड़े मामलों में पुलिस की भूमिका को लेकर कई सवाल उठाए।
मामला नालंदा के एक अस्पताल से नवजात बच्चे के कथित रूप से गायब होने से जुड़ा है। बच्चे के पिता ने अदालत का रुख किया था। सुनवाई के दौरान अदालत को बताया गया कि अस्पताल से बच्चा गायब होने के बाद मामले की जांच की जा रही है। इस मामले में अस्पताल का लाइसेंस रद्द करने की कार्रवाई भी शुरू की गई है। पुलिस इस बात की जांच कर रही है कि कहीं बच्चे को किसी गिरोह या बिचौलिये के माध्यम से दूसरे स्थान पर तो नहीं ले जाया गया।
सुनवाई के दौरान सामने आया करीब 14,500 बच्चों के लापता होने का आंकड़ा पूरे मामले को और गंभीर बना देता है। हालांकि, इस आंकड़े का मतलब यह नहीं है कि सभी बच्चे किसी एक ही तरह की घटना के शिकार हुए हैं। लापता होने के मामलों के पीछे अलग-अलग परिस्थितियां हो सकती हैं और प्रत्येक मामले की अलग-अलग जांच जरूरी है।
अदालत के सामने यह भी सवाल आया कि बच्चों के लापता होने के मामलों में पुलिस किस तरह कार्रवाई करती है और उनकी तलाश के लिए क्या व्यवस्था अपनाई जाती है। खासकर नवजात और छोटे बच्चों से जुड़े मामलों में शुरुआती घंटों और दिनों में जांच बेहद महत्वपूर्ण मानी जाती है। अस्पतालों में सुरक्षा व्यवस्था, प्रवेश-निकास की निगरानी और मरीजों तथा उनके परिजनों की पहचान की व्यवस्था भी ऐसे मामलों में महत्वपूर्ण हो जाती है।
नालंदा के मामले में पुलिस ने जांच के दौरान इस संभावना की भी पड़ताल शुरू की कि कहीं अंतर-जिला या अंतर-राज्य स्तर पर सक्रिय कोई गिरोह या बिचौलिये इसमें शामिल तो नहीं हैं। पुलिस इस दिशा में उपलब्ध सुरागों और संबंधित लोगों की गतिविधियों की जांच कर रही है।
अदालत में यह मामला केवल एक नवजात के गायब होने तक सीमित नहीं रहा। बिहार में बड़ी संख्या में बच्चों के लापता होने की जानकारी सामने आने के बाद बच्चों की सुरक्षा से जुड़े व्यापक सवाल भी उठे। ऐसे मामलों में पुलिस रिकॉर्ड, गुमशुदगी की रिपोर्ट, बच्चों की बरामदगी और लंबित मामलों की स्थिति की समीक्षा महत्वपूर्ण हो सकती है।
बच्चों के लापता होने के मामलों में परिवारों के सामने सबसे बड़ी समस्या यह होती है कि शुरुआती समय में उन्हें सही जानकारी और जांच की प्रगति नहीं मिल पाती। कई परिवार आर्थिक और सामाजिक रूप से कमजोर होते हैं और लंबे समय तक अपने बच्चों की तलाश में अलग-अलग जगहों पर भटकते रहते हैं। ऐसे में पुलिस और प्रशासन की जिम्मेदारी बढ़ जाती है कि शिकायत मिलने के बाद मामले को गंभीरता से लिया जाए और उपलब्ध तकनीकी तथा स्थानीय संसाधनों का इस्तेमाल किया जाए।
अस्पतालों में नवजात बच्चों की सुरक्षा भी इस मामले का एक महत्वपूर्ण पहलू है। अस्पतालों में सीसीटीवी कैमरे, प्रवेश-निकास पर निगरानी, स्टाफ की पहचान और नवजात वार्ड में नियंत्रित आवाजाही जैसी व्यवस्थाएं बच्चों की सुरक्षा में मदद कर सकती हैं। किसी बच्चे के गायब होने की स्थिति में अस्पताल के रिकॉर्ड और कैमरों की फुटेज जांच का महत्वपूर्ण हिस्सा बन सकते हैं।
इस मामले में अदालत की सुनवाई के दौरान पुलिस और प्रशासन की जवाबदेही से जुड़े सवाल भी सामने आए हैं। अदालत का हस्तक्षेप इस बात की ओर ध्यान खींचता है कि लापता बच्चों के मामलों की जांच केवल कागजी प्रक्रिया तक सीमित न रहे, बल्कि बच्चों की सुरक्षित बरामदगी के लिए प्रभावी कार्रवाई हो।
नालंदा के नवजात बच्चे के मामले की जांच जारी है और पुलिस यह पता लगाने की कोशिश कर रही है कि बच्चा कहां गया और उसके गायब होने के पीछे कौन जिम्मेदार है। साथ ही बिहार में लापता बच्चों की बड़ी संख्या का मुद्दा भी अदालत की निगरानी में महत्वपूर्ण विषय बन गया है। इस मामले में आगे की सुनवाई और जांच से यह स्पष्ट होने की उम्मीद है कि लापता बच्चों की तलाश और उनकी सुरक्षा के लिए प्रशासनिक स्तर पर क्या कदम उठाए जाते हैं।
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