Last updated: September 26th, 2026 at 02:03 pm

उत्तर प्रदेश के सोनभद्र में साइबर ठगी का एक बड़ा मामला सामने आया है, जहां एक सेवानिवृत्त अधिकारी से कथित तौर पर डिजिटल अरेस्ट के नाम पर करीब 2.36 करोड़ रुपये ट्रांसफर करा लिए गए। पुलिस के मुताबिक ठगों ने खुद को न्यायपालिका और सरकारी विभागों से जुड़े अधिकारी बताकर पीड़ित को डराया और लगातार निगरानी में होने का दबाव बनाया। मामले की जांच के दौरान साइबर क्राइम पुलिस ने तीन आरोपियों को गिरफ्तार किया है। पुलिस ने ठगी की रकम में से करीब 75 लाख रुपये को होल्ड या फ्रीज कराने का दावा किया है।
मामला 22 सितंबर को उस समय सामने आया, जब स्टेट बैंक ऑफ इंडिया की रॉबर्ट्सगंज शाखा के अधिकारियों को एक सेवानिवृत्त खाताधारक के खाते से लगातार बड़े लेनदेन पर संदेह हुआ। बैंक अधिकारियों के अनुसार खाते से काफी रकम अलग-अलग खातों में भेजी जा रही थी। पीड़ित के व्यवहार और लगातार फोन पर अलग-थलग रहकर बातचीत करने के कारण बैंक कर्मचारियों को आशंका हुई कि वह किसी दबाव में है। इसके बाद बैंक प्रबंधन ने साइबर क्राइम पुलिस को सूचना दी।
पुलिस के मुताबिक जांच में पता चला कि पीड़ित को साइबर ठगों ने डिजिटल अरेस्ट का भय दिखाया था। आरोपियों ने कथित तौर पर उसे बताया कि वह किसी गंभीर कानूनी मामले में फंस गया है और उसके खिलाफ कार्रवाई हो सकती है। इसी डर का इस्तेमाल करते हुए उससे अलग-अलग बैंक खातों में लगभग 2.36 करोड़ रुपये ट्रांसफर कराए गए। पुलिस का कहना है कि रकम मिलने के बाद भी आरोपी और पैसे की मांग कर रहे थे।
पुलिस ने बैंकिंग लेनदेन और इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों की जांच शुरू की। संबंधित बैंक खातों की जानकारी जुटाकर उनमें आगे होने वाले लेनदेन पर रोक लगाने की कोशिश की गई। इस कार्रवाई में करीब 75 लाख रुपये की रकम को होल्ड या फ्रीज कराया गया। पुलिस अब बाकी रकम का पता लगाने और यह जानने में जुटी है कि पैसा किन-किन खातों में गया और उससे जुड़े अन्य लोग कौन हैं।
जांच के दौरान पुलिस ने कथित मुख्य आरोपी अरुण कुमार दूबे को प्रयागराज के ओमैक्स अपार्टमेंट से गिरफ्तार किया। पुलिस के अनुसार आरोपी एक फार्मास्युटिकल कंपनी में काम करने के साथ प्रॉपर्टी कारोबार से भी जुड़ा था। जांच एजेंसी का आरोप है कि उसने आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस तकनीक का इस्तेमाल करके डीपफेक तस्वीरें और फर्जी दस्तावेज तैयार किए, जिनका इस्तेमाल पीड़ितों को डराने और अपनी पहचान को विश्वसनीय दिखाने के लिए किया जाता था।
पुलिस ने आरोपी की निशानदेही पर कथित तौर पर ठगी की रकम से खरीदी गई टाटा हैरियर कार, 2.10 लाख रुपये नकद, पांच एंड्रॉयड मोबाइल फोन और इलाहाबाद हाईकोर्ट के अधिवक्ता के नाम से बना एक कथित फर्जी पहचान पत्र बरामद किया है। पुलिस इन सामानों और मोबाइल उपकरणों की जांच के जरिए कथित साइबर नेटवर्क की अन्य कड़ियों का पता लगाने की कोशिश कर रही है।
मामले में दो महिलाओं प्रियंका मिश्रा और तेजल को भी गिरफ्तार किया गया है। पुलिस के अनुसार तेजल मुख्य आरोपी की मंगेतर है और प्रियंका उसकी मां हैं। जांच एजेंसियां यह पता लगाने में जुटी हैं कि दोनों की कथित भूमिका क्या थी और ठगी से जुड़े पैसों के लेनदेन में उनका कितना योगदान रहा। पुलिस का कहना है कि पूरे नेटवर्क में अन्य लोगों की संभावित भूमिका की भी जांच की जा रही है।
इस मामले में बैंक कर्मचारियों की सतर्कता भी महत्वपूर्ण रही। लगातार बड़े लेनदेन और खाताधारक के असामान्य व्यवहार को देखकर बैंक ने साइबर पुलिस को सूचना दी, जिसके बाद जांच आगे बढ़ी। साइबर ठगी के मामलों में शुरुआती स्तर पर बैंक को सूचना मिलने से संदिग्ध खातों में रकम के आगे ट्रांसफर को रोकने और कुछ राशि को सुरक्षित करने में मदद मिल सकती है।
डिजिटल अरेस्ट के नाम पर होने वाली ठगी में अपराधी अक्सर पुलिस, अदालत, सरकारी विभाग या अन्य प्रतिष्ठित संस्थाओं के अधिकारी बनकर वीडियो कॉल और फोन के जरिए लोगों पर दबाव बनाते हैं। इस मामले में भी पुलिस के अनुसार न्यायिक और सरकारी अधिकारियों का नाम लेकर पीड़ित को डराया गया। जांच में कथित डीपफेक तकनीक और फर्जी दस्तावेजों के इस्तेमाल की बात भी सामने आई है।
पुलिस ठगी की पूरी रकम को ट्रेस करने, बैंक खातों की जांच करने, डिजिटल उपकरणों से साक्ष्य जुटाने और संभावित अन्य आरोपियों की पहचान करने में लगी है। गिरफ्तार आरोपियों के खिलाफ दर्ज मामले में आगे की कानूनी कार्रवाई जांच के आधार पर की जाएगी। पुलिस की जांच पूरी होने के बाद ही इस कथित साइबर नेटवर्क की पूरी संरचना और अन्य संभावित मामलों से इसके संबंध स्पष्ट हो सकेंगे।
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