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फर्जी दस्तावेज से नियुक्ति का दावा, इलाहाबाद हाईकोर्ट ने शिक्षक की वेतन याचिका खारिज की

  इलाहाबाद हाईकोर्ट ने फर्जी अनुमोदन आदेश के आधार पर सरकारी खजाने से वेतन और अन्य सेवा लाभ पाने के
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    इलाहाबाद हाईकोर्ट ने फर्जी अनुमोदन आदेश के आधार पर सरकारी खजाने से वेतन और अन्य सेवा लाभ पाने के दावे को खारिज कर दिया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि यदि किसी कर्मचारी की नियुक्ति का आधार ही फर्जी दस्तावेज है, तो केवल लंबे समय तक काम करने या पहले जारी किसी प्रशासनिक आदेश के आधार पर उसे सरकारी वेतन पाने का कानूनी अधिकार नहीं मिल जाता। अदालत ने कहा कि सरकारी खजाने से वेतन पाने के लिए वैध नियुक्ति और स्वीकृत पद पर नियुक्ति होना जरूरी है।

     

    यह मामला संत कबीर नगर के महात्मा गांधी कृषक पूर्व माध्यमिक विद्यालय, किनोना, कुरथिया से जुड़ा है। वहां सहायक अध्यापक शीतला प्रसाद ने अपनी नियुक्ति और बकाया वेतन के भुगतान की मांग करते हुए हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। याची ने दावा किया था कि उसकी नियुक्ति वर्ष 1977 में हुई थी और जिला बेसिक शिक्षा अधिकारी ने 29 जुलाई 1982 को उसकी नियुक्ति को मंजूरी दी थी।

     

    याची की ओर से यह भी कहा गया कि बाद में 9 मार्च 2000 को अधिकारियों ने एक मार्च 1991 से वेतन भुगतान का आदेश जारी किया था, लेकिन इसके बावजूद उसे वेतन नहीं मिला। उसका तर्क था कि उसके साथ नियुक्त किए गए अन्य शिक्षक वेतन प्राप्त कर रहे हैं, जबकि उसे इससे वंचित रखा गया है।

     

    मामले की सुनवाई के दौरान राज्य सरकार की ओर से नियुक्ति की वैधता पर सवाल उठाया गया। सरकार का कहना था कि याची की नियुक्ति किसी स्वीकृत पद पर नहीं हुई थी और नियुक्ति से संबंधित महत्वपूर्ण मूल रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं थे। वर्ष 1982 के कथित अनुमोदन आदेश की प्रमाणिकता पर भी सवाल उठाया गया था।

     

    अदालत के सामने विभागीय रिकॉर्ड भी रखा गया। रिकॉर्ड की जांच में सामने आया कि कथित अनुमोदन आदेश की प्रमाणिकता साबित करने वाले विश्वसनीय समकालीन दस्तावेज उपलब्ध नहीं थे। विभागीय अभिलेखों में भी याची का नाम कई महत्वपूर्ण दस्तावेजों में नहीं पाया गया।

     

    विद्यालय प्रबंधन की ओर से भी यह बताया गया कि याची ने वर्ष 2005 तक ही काम किया था। इसके बाद लगातार सेवा में रहने का पर्याप्त प्रमाण अदालत के सामने पेश नहीं किया जा सका। इस आधार पर भी अदालत ने वेतन के दावे को स्वीकार नहीं किया।

     

    हाईकोर्ट ने कहा कि किसी नियुक्ति की वैधता केवल इस आधार पर स्थापित नहीं हो सकती कि संबंधित व्यक्ति ने लंबे समय तक काम किया है या किसी समय उसके पक्ष में कोई प्रशासनिक आदेश जारी हुआ था। यदि नियुक्ति की बुनियाद ही वैध नहीं है, तो उससे सरकारी वेतन और अन्य सेवा लाभ पाने का अधिकार स्वतः पैदा नहीं होता।

     

    अदालत ने यह भी पाया कि संबंधित अधिकारी ने पहले के न्यायालयी निर्देश के अनुसार याची को सुनवाई का अवसर दिया था। उपलब्ध रिकॉर्ड की जांच के बाद उसके दावे को खारिज किया गया था। हाईकोर्ट ने इस प्रक्रिया में हस्तक्षेप करने का आधार नहीं पाया।

     

    इस मामले में नियुक्ति से जुड़े पुराने दस्तावेजों की प्रामाणिकता सबसे महत्वपूर्ण मुद्दा रही। अदालत ने माना कि याची कथित अनुमोदन आदेश को साबित करने के लिए पर्याप्त और विश्वसनीय दस्तावेज प्रस्तुत नहीं कर सका। विभागीय रिकॉर्ड की जांच में भी उस आदेश को सही साबित करने वाला आधार नहीं मिला।

     

    हाईकोर्ट का यह आदेश सरकारी संस्थानों में नियुक्तियों के रिकॉर्ड और दस्तावेजों की प्रमाणिकता के महत्व को भी सामने लाता है। सरकारी पद पर नियुक्ति के लिए केवल काम करना पर्याप्त नहीं है, बल्कि नियुक्ति का वैधानिक आधार, स्वीकृत पद और संबंधित दस्तावेजों की वैधता भी जरूरी है।

     

    उत्तर प्रदेश में फर्जी प्रमाणपत्र या दस्तावेजों के आधार पर हुई नियुक्तियों को लेकर पहले भी न्यायिक स्तर पर कार्रवाई और जांच के निर्देश सामने आते रहे हैं। ऐसे मामलों में अदालतें नियुक्ति की वैधता के साथ सरकारी धन से किए गए वेतन भुगतान के अधिकार को भी अलग-अलग आधार पर देख रही हैं।

     

    संत कबीर नगर के इस मामले में हाईकोर्ट ने शिक्षक की वेतन और सेवा लाभ संबंधी याचिका खारिज कर दी है। अदालत के फैसले में यह स्पष्ट किया गया है कि फर्जी या अप्रमाणित नियुक्ति आदेश के आधार पर सरकारी खजाने से वेतन पाने का दावा कानूनी अधिकार के रूप में स्वीकार नहीं किया जा सकता।

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