Last updated: October 13th, 2026 at 08:18 am
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ कथित आपत्तिजनक टिप्पणी से जुड़े आपराधिक मानहानि मामले में कांग्रेस नेता राहुल गांधी को सुप्रीम कोर्ट से राहत मिली है। शीर्ष अदालत ने मामले में निचली अदालत में चल रही सुनवाई पर रोक लगा दी है। यह मामला राहुल गांधी की उस कथित टिप्पणी से जुड़ा है, जिसमें उन्होंने नरेंद्र मोदी को ‘चोरों का सरदार’ और ‘कमांडर-इन-थीफ’ कहा था।
जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस अपारेश कुमार सिंह की पीठ ने बॉम्बे हाई कोर्ट के 8 सितंबर के फैसले को चुनौती देने वाली राहुल गांधी की याचिका पर नोटिस जारी किया है। हाई कोर्ट ने आपराधिक मानहानि की शिकायत रद्द करने से इनकार कर दिया था। सुप्रीम कोर्ट ने संबंधित पक्षों से चार सप्ताह के भीतर जवाब दाखिल करने को कहा है। इस दौरान ट्रायल कोर्ट में आगे की कार्यवाही पर रोक रहेगी।
राहुल गांधी ने हाई कोर्ट में क्या दलील दी थी?
राहुल गांधी ने बॉम्बे हाई कोर्ट में मजिस्ट्रेट अदालत की ओर से जारी समन को चुनौती दी थी। उनकी दलील थी कि बीजेपी कार्यकर्ता की ओर से दाखिल शिकायत कानूनी रूप से सुनवाई योग्य नहीं है। उन्होंने कहा था कि कथित टिप्पणी में किसी राजनीतिक दल का नाम नहीं लिया गया और न ही किसी स्पष्ट रूप से पहचाने जा सकने वाले व्यक्ति या समूह को निशाना बनाया गया। ऐसे में शिकायतकर्ता को मानहानि का मुकदमा चलाने का अधिकार नहीं है।
बीजेपी कार्यकर्ता ने क्यों दर्ज कराई शिकायत?
यह शिकायत बीजेपी कार्यकर्ता महेश श्रीश्रीमाल ने मेट्रोपॉलिटन मजिस्ट्रेट की अदालत में दाखिल की थी। शिकायतकर्ता का आरोप था कि राहुल गांधी की टिप्पणियों से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, बीजेपी और उसके सदस्यों की प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचा।
शिकायत में दावा किया गया कि प्रधानमंत्री को ‘चोरों का सरदार’ कहने का अर्थ बीजेपी के सदस्यों को भी चोर बताना है। इसी आधार पर शिकायतकर्ता ने मानहानि की कार्यवाही शुरू करने का अधिकार होने की दलील दी थी।
बॉम्बे हाई कोर्ट ने क्या कहा था?
बॉम्बे हाई कोर्ट ने शिकायत रद्द करने से इनकार करते हुए कहा था कि शिकायतकर्ता लंबे समय से बीजेपी का सक्रिय सदस्य होने का दावा करता है। अदालत के अनुसार, शुरुआती स्तर पर यह नहीं माना जा सकता कि कथित टिप्पणी केवल पार्टी के वरिष्ठ नेताओं तक सीमित थी। टिप्पणी का वास्तविक अर्थ और पार्टी के सदस्यों पर उसका प्रभाव जैसे सवालों पर मुकदमे की सुनवाई के दौरान विचार किया जा सकता है।
हाई कोर्ट ने अपने फैसले में दिल्ली हाई कोर्ट के उस निर्णय का भी उल्लेख किया था, जिसमें राजनीतिक दल को पंजीकरण के आधार पर एक पहचानी जा सकने वाली संस्था माना गया था।
अब आगे क्या होगा?
सुप्रीम कोर्ट के नोटिस के बाद संबंधित पक्षों को चार सप्ताह के भीतर जवाब देना होगा। फिलहाल ट्रायल कोर्ट की कार्यवाही पर रोक रहेगी। अब मामले में आगे की कानूनी प्रक्रिया सुप्रीम कोर्ट में होने वाली सुनवाई और पक्षकारों के जवाब पर निर्भर करेगी।
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