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दिल्ली में CEC ज्ञानेश कुमार के खिलाफ प्रदर्शन पर बड़ा पुलिस एक्शन, हजारों प्रदर्शनकारी हिरासत में; सुप्रीम कोर्ट ने शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों के अधिकारों पर दिया जोर

    दिल्ली में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ जारी विरोध प्रदर्शनों के बीच पुलिस की कार्रवाई और
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    दिल्ली में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ जारी विरोध प्रदर्शनों के बीच पुलिस की कार्रवाई और प्रदर्शनकारियों के अधिकारों को लेकर विवाद तेज हो गया है। मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR के विरोध में राजधानी में हुए प्रदर्शनों के दौरान हजारों लोगों को हिरासत में लिए जाने की खबर सामने आई है। शनिवार, 10 अक्टूबर को प्रस्तावित प्रदर्शन को रोकने के लिए दिल्ली में व्यापक सुरक्षा व्यवस्था की गई थी। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों के अधिकारों, सार्वजनिक परिवहन और लोगों की आवाजाही को लेकर महत्वपूर्ण निर्देश दिए। मंगलवार, 13 अक्टूबर को इस मामले से जुड़ी याचिकाओं पर सुनवाई होनी थी, लेकिन अदालत ने सुनवाई गुरुवार तक टाल दी।

     

    यह विवाद चुनाव आयोग की ओर से मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण की प्रक्रिया को लेकर शुरू हुआ। विपक्षी दलों और कुछ सामाजिक संगठनों का आरोप है कि इस प्रक्रिया के दौरान बड़ी संख्या में मतदाताओं के नाम हटाए गए हैं और इससे पात्र मतदाताओं के मतदान के अधिकार पर असर पड़ सकता है। प्रदर्शनकारी मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे और मतदाता सूची के पुनरीक्षण की प्रक्रिया की जांच की मांग कर रहे हैं। दूसरी ओर, चुनाव आयोग और भारतीय जनता पार्टी ने विपक्ष के आरोपों को खारिज किया है।

     

    10 अक्टूबर को दिल्ली में प्रदर्शन की संभावना को देखते हुए पुलिस ने राजधानी के कई हिस्सों में सुरक्षा बढ़ा दी थी। रिपोर्टों के मुताबिक, लगभग 41 हजार सुरक्षाकर्मियों को तैनात किया गया और बड़ी संख्या में प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लिया गया। अलग-अलग रिपोर्टों में हिरासत में लिए गए लोगों की संख्या अलग बताई गई है। पुलिस की कार्रवाई के दौरान प्रदर्शनकारियों को निर्धारित स्थानों पर जाने से रोका गया और कई जगह बैरिकेडिंग की गई। इसके बाद पुलिस की कार्रवाई और लोगों की आवाजाही पर प्रतिबंध को लेकर सवाल उठने लगे।

     

    मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचने पर अदालत ने 11 अक्टूबर को स्पष्ट किया कि शांतिपूर्ण और निहत्थे प्रदर्शनकारियों को कानून में निर्धारित प्रक्रिया के बिना हिरासत में नहीं रखा जा सकता। अदालत ने अधिकारियों को लोगों की स्वतंत्र आवाजाही सुनिश्चित करने, दिल्ली में मेट्रो और रेलवे सेवाओं को सामान्य रूप से चलने देने तथा इंटरनेट सेवाओं को बाधित नहीं करने का निर्देश भी दिया। अदालत ने सुप्रीम कोर्ट और अन्य न्यायालय परिसरों के आसपास लगाए गए प्रतिबंधों को हटाने की बात कही, ताकि लोगों को न्याय तक पहुंचने में परेशानी न हो।

     

    सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के बाद भी दिल्ली में प्रदर्शन पूरी तरह थमे नहीं। रविवार और सोमवार को राजधानी के विभिन्न इलाकों में विरोध प्रदर्शन हुए। सोमवार, 12 अक्टूबर को राहुल गांधी समेत विपक्षी गठबंधन के कई नेताओं ने सुप्रीम कोर्ट की ओर मार्च किया और चुनावी प्रक्रिया से जुड़े आरोपों पर न्यायिक हस्तक्षेप की मांग की। इस दौरान नई दिल्ली और मध्य दिल्ली के कुछ इलाकों में यातायात प्रभावित हुआ तथा पुलिस ने सुरक्षा व्यवस्था बनाए रखने के लिए अतिरिक्त कदम उठाए।

     

    मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट में प्रदर्शन, हिरासत और यातायात प्रतिबंधों से संबंधित याचिकाओं पर सुनवाई निर्धारित थी। हालांकि, न्यायमूर्ति वी. मोहना की तबीयत खराब होने के कारण सुनवाई 15 अक्टूबर तक स्थगित कर दी गई। केंद्र सरकार को अपना जवाब दाखिल करने के लिए अतिरिक्त समय भी दिया गया। इन याचिकाओं में कथित अवैध हिरासत, मेट्रो और रेल सेवाओं पर प्रतिबंध तथा प्रदर्शनकारियों के साथ कथित दुर्व्यवहार जैसे मुद्दे उठाए गए हैं।

     

    इसी बीच, मंगलवार को जंतर-मंतर पर भी विरोध प्रदर्शन से जुड़ा एक घटनाक्रम सामने आया। पुलिस द्वारा जंतर-मंतर को आधिकारिक प्रदर्शन स्थल के रूप में निर्धारित सूची से हटाने की घोषणा के बाद कुछ कार्यकर्ताओं ने बैरिकेड पार कर परिसर में प्रवेश करने की कोशिश की। इस दौरान कॉकroach जनता पार्टी से जुड़े कुछ नेताओं को हिरासत में लिए जाने की खबर सामने आई। वहीं, दिल्ली के कनॉट प्लेस क्षेत्र में भी कुछ छात्र कार्यकर्ताओं को प्रदर्शन के दौरान पुलिस वाहनों में ले जाते देखा गया।

     

    इस पूरे घटनाक्रम ने लोकतांत्रिक विरोध के अधिकार और कानून-व्यवस्था बनाए रखने की जिम्मेदारी के बीच संतुलन पर बहस तेज कर दी है। प्रदर्शनकारियों का कहना है कि उन्हें अपनी मांगें शांतिपूर्ण तरीके से उठाने का अधिकार मिलना चाहिए। वहीं, प्रशासन का कहना है कि सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखना और संवेदनशील क्षेत्रों में सुरक्षा सुनिश्चित करना जरूरी है।

     

    सभी की नजर 15 अक्टूबर को होने वाली सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई पर है। अदालत में आगे की कार्यवाही से यह स्पष्ट हो सकता है कि हिरासत, यातायात प्रतिबंधों और प्रदर्शनकारियों के अधिकारों से जुड़े आरोपों पर क्या निर्देश दिए जाते हैं। साथ ही, मतदाता सूची के पुनरीक्षण को लेकर जारी राजनीतिक विवाद के कानूनी पहलुओं पर भी आगे चर्चा होने की संभावना है।

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