Last updated: October 15th, 2026 at 03:54 pm

नई दिल्ली। दिल्ली में 10 अक्टूबर को प्रस्तावित विरोध प्रदर्शन के दौरान मेट्रो स्टेशनों पर लगाए गए प्रतिबंधों को लेकर दिल्ली मेट्रो रेल कॉरपोरेशन (DMRC) ने सुप्रीम कोर्ट में बिना शर्त माफी मांगी है। निगम ने अपने हलफनामे में कहा कि उस दिन दिल्ली मेट्रो की पूरी सेवा बंद नहीं की गई थी, बल्कि 303 स्टेशनों में से 45 पर यात्रियों के प्रवेश और निकास को सीमित किया गया था। DMRC के मुताबिक, सभी निर्धारित ट्रेन सेवाएं संचालित हुईं और प्रतिबंध उसी दिन रात 10 बजे हटा दिए गए। यह मामला अब सार्वजनिक परिवहन, नागरिकों की आवाजाही और पुलिस की सुरक्षा व्यवस्था के बीच संतुलन को लेकर चर्चा में है।
सुप्रीम कोर्ट ने 9 अक्टूबर को दिल्ली मेट्रो और रेलवे सेवाओं पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने की संभावना पर सवाल उठाए थे। अदालत ने कहा था कि आवश्यक सार्वजनिक परिवहन को पूरी तरह रोकने के बजाय जरूरत के अनुसार नियंत्रित किया जाना चाहिए। सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार की ओर से अधिकारियों को प्रतिबंधों पर दोबारा विचार करने के लिए कहा गया था। अदालत ने यह भी निर्देश दिया था कि यात्रियों को असुविधा से बचाने के लिए फैसलों और यातायात संबंधी सूचनाओं का व्यापक प्रचार किया जाए।
इसके बाद 11 अक्टूबर को सुप्रीम कोर्ट ने संबंधित याचिकाओं पर विशेष सुनवाई की। याचिकाकर्ताओं ने आरोप लगाया कि 10 अक्टूबर के प्रदर्शन से पहले मेट्रो स्टेशनों और रेलवे सेवाओं पर लगाए गए प्रतिबंधों के कारण लोगों की आवाजाही प्रभावित हुई। कुछ याचिकाओं में प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लेने और पुलिस कार्रवाई को लेकर भी सवाल उठाए गए। अदालत ने संबंधित अधिकारियों को नोटिस जारी करते हुए जवाब और अनुपालन रिपोर्ट मांगी थी।
DMRC ने अपने जवाब में कहा कि मेट्रो नेटवर्क पूरी तरह बंद नहीं था। निगम के अनुसार, 303 में से 258 स्टेशन सामान्य रूप से यात्रियों के लिए खुले रहे, जबकि 45 स्टेशनों पर प्रवेश और निकास नियंत्रित किया गया। हलफनामे में दावा किया गया कि उस दिन सभी निर्धारित ट्रेनें चलीं और सेवाओं की संख्या में कटौती नहीं की गई। निगम ने यह भी बताया कि 14 इंटरचेंज स्टेशनों पर यात्रियों को एक लाइन से दूसरी लाइन में जाने की सुविधा जारी रही।
DMRC के मुताबिक, 10 अक्टूबर को लगभग 32 लाख यात्रियों ने मेट्रो से सफर किया, जबकि सामान्य दूसरे शनिवार को यह संख्या करीब 58 लाख रहती है। निगम ने यात्रियों की संख्या में आई गिरावट को विरोध प्रदर्शन के कारण पैदा हुई परिस्थितियों से जोड़ा। उसका कहना है कि कई यात्रियों ने उस दिन बाहर निकलने या अपने नियमित काम पर जाने से परहेज किया होगा। हालांकि, यात्रियों की संख्या में गिरावट के पीछे सभी कारणों का स्वतंत्र रूप से निर्धारण होना अभी बाकी है।
निगम ने अदालत में बिना शर्त माफी मांगते हुए कहा कि वह सुप्रीम कोर्ट का पूरा सम्मान करता है। साथ ही उसने यह भी कहा कि 9 अक्टूबर का आदेश उसके पक्ष को सुने बिना पारित हुआ था और उसे आदेश की जानकारी मिलने के बाद संबंधित स्थिति स्पष्ट करने के लिए हलफनामा दाखिल किया गया। माफी मांगना अपने आप में अदालत के आदेश के उल्लंघन को स्वीकार करना नहीं है। DMRC ने अपने जवाब में यह रुख रखा है कि उसकी ओर से मेट्रो नेटवर्क का पूर्ण बंद नहीं किया गया था।
विवाद की पृष्ठभूमि में 10 अक्टूबर को कॉकroach जनता पार्टी और कुछ छात्र संगठनों की ओर से मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ प्रस्तावित विरोध प्रदर्शन था। प्रदर्शन को देखते हुए दिल्ली पुलिस ने सुरक्षा संबंधी कदम उठाए थे। पहले जारी निर्देशों में अधिक स्टेशनों पर प्रवेश और निकास बंद करने की बात थी, लेकिन बाद में प्रतिबंधों का दायरा कम किया गया। इसी कार्रवाई को लेकर अदालत में सवाल उठे कि सुरक्षा व्यवस्था बनाए रखने के लिए उठाए गए कदम जरूरत के अनुपात में थे या नहीं।
सुप्रीम कोर्ट ने पहले ही स्पष्ट किया था कि मेट्रो और रेलवे सेवाएं सामान्य रूप से चलनी चाहिए, जब तक कानून-व्यवस्था की वास्तविक जरूरतों के कारण उनका नियंत्रित संचालन आवश्यक न हो। अदालत ने दिल्ली में लोगों की आवाजाही सुनिश्चित करने और वकीलों, पत्रकारों तथा अन्य पेशेवरों को अपने काम में अनुचित बाधा से बचाने पर भी जोर दिया है।
DMRC का हलफनामा अदालत के सामने उसका पक्ष रखता है, लेकिन प्रतिबंधों की वैधता और संबंधित अधिकारियों की जवाबदेही पर अंतिम न्यायिक निष्कर्ष अलग विषय हैं। आगे की सुनवाई में अदालत निगम, पुलिस और अन्य संबंधित अधिकारियों के जवाबों के आधार पर यह देख सकती है कि उसके पहले के निर्देशों का पालन किस हद तक हुआ और भविष्य में ऐसी परिस्थितियों में सार्वजनिक परिवहन को बाधित किए बिना सुरक्षा कैसे सुनिश्चित की जा सकती है।
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