Last updated: October 17th, 2026 at 01:35 pm

उत्तर प्रदेश के मेरठ में चर्चित सौरभ राजपूत हत्याकांड एक बार फिर सुर्खियों में है। अदालत ने इस मामले में दोषी करार दी गई मुस्कान रस्तोगी और उसके साथी साहिल शुक्ला को मृत्युदंड की सजा सुनाई है। इस फैसले के बाद दोनों दोषियों की ओर से सजा को उच्च न्यायालय में चुनौती देने की तैयारी की जा रही है। मामले ने पिछले साल देशभर में लोगों का ध्यान खींचा था, जब सौरभ का शव एक नीले प्लास्टिक के ड्रम में सीमेंट से छिपाकर रखे जाने की बात सामने आई थी।
मेरठ की जिला एवं सत्र अदालत ने 14 अक्टूबर 2026 को दोनों को मौत की सजा सुनाई। इससे पहले 30 सितंबर को अदालत ने उन्हें सौरभ राजपूत की हत्या और सबूत मिटाने के मामले में दोषी ठहराया था। सुनवाई के दौरान अभियोजन पक्ष ने अपराध की गंभीरता और उसकी सुनियोजित प्रकृति को देखते हुए अधिकतम सजा देने की मांग की थी। अदालत ने मामले को अत्यंत गंभीर मानते हुए दोनों को मृत्युदंड दिया। इसके साथ ही संबंधित अपराधों के लिए जुर्माना भी लगाया गया।
सौरभ राजपूत पूर्व मर्चेंट नेवी अधिकारी थे। उनकी हत्या मार्च 2025 में मेरठ में हुई थी। अभियोजन पक्ष के अनुसार, मुस्कान और साहिल ने मिलकर इस वारदात को अंजाम दिया था। आरोप था कि हत्या के बाद शव के टुकड़े किए गए और उन्हें एक नीले ड्रम में रखकर सीमेंट से बंद कर दिया गया, ताकि घटना का खुलासा न हो सके। बाद में पुलिस की जांच में यह मामला सामने आया और दोनों आरोपियों को गिरफ्तार किया गया।
जांच एजेंसियों ने मामले में परिस्थितिजन्य साक्ष्यों, फॉरेंसिक रिपोर्ट, कॉल डिटेल रिकॉर्ड, सीसीटीवी फुटेज और विभिन्न लोगों के बयानों सहित कई तरह के साक्ष्य जुटाए। पुलिस ने विस्तृत आरोपपत्र दाखिल किया था। मुकदमे के दौरान अभियोजन पक्ष ने 22 गवाहों के बयान पेश किए। मामले में प्रत्यक्षदर्शी न होने के बावजूद अभियोजन ने उपलब्ध साक्ष्यों और घटनाक्रम की कड़ियों के आधार पर अपना पक्ष रखा। अदालत ने साक्ष्यों पर विचार करने के बाद दोनों को दोषी ठहराया और फिर सजा सुनाई।
फैसले के बाद जेल प्रशासन से जुड़ी रिपोर्टों के अनुसार, मुस्कान और साहिल को अलग-अलग कैदी नंबर आवंटित किए गए हैं। सजा सुनाए जाने के बाद दोनों के भावुक होने की भी खबरें सामने आईं। अब उनकी ओर से कानूनी विकल्पों का इस्तेमाल किए जाने की तैयारी है। बचाव पक्ष उच्च न्यायालय में सजा को चुनौती दे सकता है और अदालत के फैसले के खिलाफ अपील कर सकता है।
हालांकि, मृत्युदंड सुनाए जाने का अर्थ यह नहीं है कि सजा पर तत्काल अमल हो जाएगा। भारतीय न्यायिक व्यवस्था में सत्र अदालत द्वारा दी गई फांसी की सजा की उच्च न्यायालय से पुष्टि आवश्यक होती है। उच्च न्यायालय मामले के तथ्यों, साक्ष्यों और कानूनी पहलुओं की समीक्षा करेगा। इसके बाद कानून के अनुसार आगे की अपील और अन्य उपलब्ध कानूनी प्रक्रियाओं का रास्ता भी खुला रह सकता है।
इस मामले में सौरभ के परिवार ने पहले ही दोषियों के लिए कड़ी सजा की मांग की थी। अदालत के फैसले के बाद परिवार को न्याय मिलने की उम्मीद से जुड़ी प्रतिक्रियाएं सामने आईं। वहीं, कानूनी प्रक्रिया के अगले चरणों पर भी सबकी नजर बनी हुई है। उच्च न्यायालय में चुनौती दिए जाने की स्थिति में मामले की सुनवाई एक बार फिर महत्वपूर्ण होगी, क्योंकि मृत्युदंड जैसे फैसले में न्यायिक समीक्षा की विशेष भूमिका होती है।
मेरठ का यह हत्याकांड अपराध की गंभीरता, साक्ष्य जुटाने की प्रक्रिया और न्यायिक कार्यवाही को लेकर चर्चा में बना हुआ है। फिलहाल निचली अदालत ने मुस्कान रस्तोगी और साहिल शुक्ला को मृत्युदंड सुनाया है, लेकिन सजा की अंतिम स्थिति उच्च न्यायालय में होने वाली कानूनी प्रक्रिया और आगे के न्यायिक निर्णयों पर निर्भर करेगी।
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