Last updated: November 2nd, 2026 at 01:09 pm

उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ स्थित किंग जॉर्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी (KGMU) में कथित धर्मांतरण, महिला डॉक्टरों के उत्पीड़न और यौन शोषण से जुड़े मामले ने नया मोड़ ले लिया है। उत्तर प्रदेश सरकार ने विशेष कार्यबल (STF) की जांच रिपोर्ट के आधार पर विश्वविद्यालय प्रशासन को संबंधित डॉक्टरों और कर्मचारियों के खिलाफ कार्रवाई करने का निर्देश दिया है। इस घटनाक्रम के बाद संस्थान में प्रशासनिक स्तर पर जांच और अनुशासनात्मक कार्रवाई की तैयारी तेज हो गई है।
मामले की शुरुआत पिछले वर्ष सामने आई कुछ शिकायतों से हुई थी। आरोप लगाया गया था कि विश्वविद्यालय के कुछ डॉक्टरों और कर्मचारियों ने महिला रेजिडेंट डॉक्टरों, नर्सिंग स्टाफ तथा अन्य महिला कर्मचारियों को कथित रूप से संबंधों में फंसाकर उनका शोषण किया और धर्म परिवर्तन के लिए दबाव बनाया। शिकायतों में यह भी कहा गया कि विरोध करने पर कुछ महिलाओं को करियर खराब करने, नौकरी समाप्त करने और परीक्षा में नुकसान पहुंचाने की धमकियां दी गईं। इन आरोपों की जांच उत्तर प्रदेश पुलिस की एसटीएफ ने की थी।
एसटीएफ ने अपनी रिपोर्ट 25 अगस्त 2026 को शासन को सौंप दी थी। इसके बाद चिकित्सा शिक्षा विभाग ने 30 अक्टूबर को KGMU के कुलसचिव को पत्र भेजकर रिपोर्ट में नामित डॉक्टरों और कर्मचारियों के खिलाफ नियमानुसार कार्रवाई करने का निर्देश दिया। शासन ने विश्वविद्यालय प्रशासन से कार्रवाई की विस्तृत रिपोर्ट भी मांगी है। निर्देश में KGMU अधिनियम 2002 और विश्वविद्यालय की परिनियमावली 2011 के तहत कार्रवाई करने को कहा गया है।
रिपोर्ट में पैथोलॉजी, गांधी वार्ड, माइक्रोबायोलॉजी और रेडियोलॉजी विभागों से जुड़े कई मामलों का उल्लेख किया गया है। विभिन्न मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, एसटीएफ ने कुल 12 डॉक्टरों और कर्मचारियों की भूमिका पर सवाल उठाए हैं। इनमें कुछ लोगों पर सीधे उत्पीड़न, शोषण और धर्म परिवर्तन के लिए दबाव बनाने के आरोप हैं, जबकि अन्य पर शिकायतों को दबाने या आरोपितों को संरक्षण देने का आरोप लगाया गया है। हालांकि, इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि और विभागीय जांच अभी बाकी है।
इस मामले में डॉ. रमीजुद्दीन उर्फ रमीज का नाम प्रमुखता से सामने आया है। वह KGMU के पैथोलॉजी विभाग में रेजिडेंट डॉक्टर थे और उन्हें जनवरी 2026 में गिरफ्तार किया गया था। उन पर एक महिला रेजिडेंट डॉक्टर के साथ कथित रूप से संबंध बनाकर धर्म परिवर्तन और विवाह का दबाव डालने का आरोप है। इस मामले में लखनऊ के चौक थाने में मुकदमा दर्ज है और पुलिस की जांच जारी है। अलग-अलग शिकायतों में अन्य डॉक्टरों और कर्मचारियों के नाम भी सामने आए हैं।
एसटीएफ की रिपोर्ट में विश्वविद्यालय प्रशासन की भूमिका पर भी सवाल उठाए गए हैं। आरोप है कि कुछ शिकायतों पर समय रहते कार्रवाई नहीं की गई और पीड़ित महिलाओं को उचित सहायता नहीं मिली। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि कुछ मामलों में शिकायतकर्ताओं को चुप कराने या उनके करियर को प्रभावित करने की कोशिश की गई। इन आरोपों के सामने आने के बाद विश्वविद्यालय में शिकायत निवारण व्यवस्था और प्रशासनिक जवाबदेही को लेकर बहस तेज हो गई है।
KGMU की कुलपति प्रोफेसर सोनिया नित्यानंद ने मामले को लेकर कार्यपरिषद की विशेष बैठक बुलाने का निर्णय लिया है। यह बैठक 6 नवंबर को प्रस्तावित है। विश्वविद्यालय के प्रवक्ता प्रोफेसर केके सिंह के अनुसार, एसटीएफ की रिपोर्ट कार्यपरिषद के सामने रखी जाएगी और उसके बाद संबंधित डॉक्टरों तथा कर्मचारियों के खिलाफ अलग-अलग विभागीय जांच समितियां गठित करने पर विचार किया जाएगा। विश्वविद्यालय प्रशासन ने स्पष्ट किया है कि रिपोर्ट में उठाए गए सभी मुद्दों की समीक्षा की जाएगी।
इस मामले में यह भी महत्वपूर्ण है कि एसटीएफ की रिपोर्ट और उसमें लगाए गए आरोप अपने आप में किसी व्यक्ति को दोषी सिद्ध नहीं करते। संबंधित कर्मचारियों को अपना पक्ष रखने का अवसर मिलेगा और विभागीय जांच के बाद ही आगे की कार्रवाई तय होगी। यदि किसी मामले में आपराधिक आरोप साबित होते हैं तो पुलिस और न्यायालय की प्रक्रिया अलग से जारी रहेगी।
KGMU का यह प्रकरण अब केवल व्यक्तिगत शिकायतों तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि संस्थान में कार्यस्थल की सुरक्षा, महिला कर्मचारियों के अधिकार, शिकायतों की निष्पक्ष जांच और प्रशासनिक जवाबदेही जैसे व्यापक मुद्दों से जुड़ गया है। 6 नवंबर की कार्यपरिषद बैठक और उसके बाद होने वाली कार्रवाई पर अब विश्वविद्यालय के कर्मचारियों, छात्रों तथा प्रदेश की राजनीति की नजर रहेगी।
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