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Delhi Pollution: सांसों पर संकट! AQI 300 के पार, PM2.5 क्यों बन रहा है सेहत का सबसे बड़ा दुश्मन?

दिल्ली की हवा एक बार फिर लोगों की सेहत के लिए खतरा बनती जा रही है। बारिश के बाद प्रदूषण
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दिल्ली की हवा एक बार फिर लोगों की सेहत के लिए खतरा बनती जा रही है। बारिश के बाद प्रदूषण से मिली अस्थायी राहत अब खत्म हो गई है। नवंबर के पहले सप्ताह में राजधानी का एयर क्वालिटी इंडेक्स (AQI) 300 के पार पहुंच गया है। कई इलाकों में हवा की गुणवत्ता ‘बहुत खराब’ श्रेणी में दर्ज की गई है। जहांगीरपुरी जैसे क्षेत्रों में AQI 400 से ऊपर पहुंचने के कारण स्थिति गंभीर हो गई है।

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    इस प्रदूषण के पीछे सबसे बड़ी चिंता हवा में मौजूद बेहद छोटे कण PM2.5 को लेकर है। उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक, दिल्ली के 58 में से 51 मॉनिटरिंग स्टेशनों पर PM2.5 प्रदूषण का प्रमुख कारक रहा। ऐसे में यह समझना जरूरी है कि AQI क्या बताता है और PM2.5 तथा PM10 में क्या अंतर है।

    AQI क्या है और 300 से ज्यादा होने का मतलब क्या है?

    AQI यानी एयर क्वालिटी इंडेक्स हवा में प्रदूषण के स्तर को बताने वाला पैमाना है। इससे पता चलता है कि किसी इलाके की हवा सांस लेने के लिहाज से कितनी साफ या प्रदूषित है।

    भारत में AQI को छह श्रेणियों में बांटा गया है:

    – 0-50: अच्छी
    – 51-100: संतोषजनक
    – 101-200: मध्यम
    – 201-300: खराब
    – 301-400: बहुत खराब
    – 401-500: गंभीर

    जब AQI 300 के पार पहुंच जाता है, तो लंबे समय तक ऐसी हवा में रहने से सांस संबंधी परेशानियां बढ़ सकती हैं। अस्थमा और फेफड़ों की बीमारियों से जूझ रहे लोगों के लिए जोखिम अधिक हो सकता है। हालांकि, प्रदूषण का असर स्वस्थ लोगों पर भी पड़ सकता है।

    PM2.5 और PM10 में आखिर क्या अंतर है?

    हवा में मौजूद धूल, धुआं, रसायन और अन्य ठोस या तरल सूक्ष्म कणों को पार्टिकुलेट मैटर (PM) कहा जाता है। इनके आकार के आधार पर इन्हें मुख्य रूप से PM10 और PM2.5 में बांटा जाता है।

    PM10: धूल और मिट्टी से निकलने वाले कण

    PM10 ऐसे कण होते हैं जिनका व्यास 10 माइक्रोमीटर या उससे कम होता है। इंसान के सिर का एक बाल लगभग 70 माइक्रोमीटर चौड़ा होता है। यानी PM10 के कण बाल से भी काफी छोटे होते हैं।

    सड़क की धूल, निर्माण कार्य, मिट्टी और औद्योगिक गतिविधियां इनके प्रमुख स्रोत हैं। ये सांस के जरिए नाक और गले तक पहुंच सकते हैं और खांसी, गले में जलन तथा आंखों में परेशानी पैदा कर सकते हैं।

    PM2.5: बेहद छोटे और ज्यादा नुकसान पहुंचाने वाले कण

    PM2.5 का व्यास 2.5 माइक्रोमीटर या उससे कम होता है। ये इतने छोटे होते हैं कि सांस के साथ फेफड़ों के गहरे हिस्सों तक पहुंच सकते हैं।

    वाहनों से निकलने वाला धुआं, उद्योगों का उत्सर्जन, पराली जलाना और पटाखों से निकलने वाले कण PM2.5 के प्रमुख स्रोतों में शामिल हैं। इनके छोटे आकार के कारण शरीर की प्राकृतिक सुरक्षा व्यवस्था इन्हें पूरी तरह रोक नहीं पाती।

    PM2.5 को सेहत के लिए इतना खतरनाक क्यों माना जाता है?

    PM2.5 के सूक्ष्म कण फेफड़ों के भीतर गहराई तक पहुंच सकते हैं। कुछ कण रक्तप्रवाह तक भी पहुंच सकते हैं। लंबे समय तक इनके संपर्क में रहने से कई गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं का जोखिम बढ़ता है।

    विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार, PM2.5 का संपर्क हृदय और फेफड़ों से जुड़ी बीमारियों के खतरे को बढ़ाता है। इससे अस्थमा की समस्या गंभीर हो सकती है, फेफड़ों की कार्यक्षमता प्रभावित हो सकती है और COPD जैसी बीमारियों का जोखिम बढ़ सकता है।

    इसके अलावा, लंबे समय तक प्रदूषित हवा में सांस लेने का संबंध हृदय रोग, स्ट्रोक और फेफड़ों के कैंसर के बढ़ते खतरे से भी पाया गया है। इसका असर केवल बुजुर्गों और पहले से बीमार लोगों पर नहीं पड़ता, बल्कि स्वस्थ व्यक्ति भी लंबे समय तक प्रदूषण के संपर्क में रहने से प्रभावित हो सकता है।

    दिल्ली की हवा में प्रदूषण का स्तर कितना ज्यादा है?

    भारत में राष्ट्रीय परिवेशी वायु गुणवत्ता मानकों के तहत PM2.5 का वार्षिक औसत स्तर 40 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर निर्धारित है। दी गई जानकारी के अनुसार, दिल्ली का वास्तविक वार्षिक औसत करीब 102 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर बताया गया है, जो राष्ट्रीय मानक से ढाई गुना से अधिक है।

    यह स्थिति बताती है कि दिल्ली में प्रदूषण नियंत्रण के लिए केवल सड़क की धूल पर ध्यान देना पर्याप्त नहीं है। वाहनों, उद्योगों और अन्य स्रोतों से निकलने वाले सूक्ष्म कणों को नियंत्रित करना भी जरूरी है।

    सर्दियों में दिल्ली की हवा क्यों हो जाती है जहरीली?

    सर्दियों में तापमान गिरने और हवा की रफ्तार कम होने से प्रदूषक कण वातावरण में लंबे समय तक बने रह सकते हैं। ठंडी हवा और मौसम की अन्य परिस्थितियों के कारण प्रदूषण जमीन के नजदीक जमा होने लगता है।

    इसके साथ ही आसपास के राज्यों में पराली जलाने से निकलने वाला धुआं, दिल्ली में वाहनों का उत्सर्जन, निर्माण गतिविधियां और औद्योगिक प्रदूषण समस्या को बढ़ा सकते हैं। दिवाली के आसपास पटाखों से निकलने वाले धुएं और रसायनों के कारण भी PM2.5 का स्तर बढ़ सकता है।

    प्रदूषण से बचने के लिए क्या सावधानियां बरतें?

    जब AQI बहुत खराब या गंभीर श्रेणी में हो, तो बाहर निकलते समय कुछ जरूरी सावधानियां अपनानी चाहिए।

    1. बाहर जाते समय सही फिटिंग वाला N95 या FFP2 मास्क पहनें। सामान्य कपड़े का मास्क सूक्ष्म प्रदूषण कणों से पर्याप्त सुरक्षा नहीं देता।
    2. AQI 300 से ऊपर होने पर बाहर सुबह की वॉक और भारी एक्सरसाइज से बचें।
    3. बच्चों, बुजुर्गों और सांस या हृदय संबंधी बीमारी से पीड़ित लोगों को विशेष सावधानी बरतनी चाहिए।
    4. घर और वाहन में प्रदूषण का स्तर कम रखने के लिए खिड़कियां और दरवाजे जरूरत के अनुसार बंद रखें।
    5. घर के अंदर हवा की गुणवत्ता खराब होने पर उपयुक्त HEPA फिल्टर वाला एयर प्यूरीफायर इस्तेमाल किया जा सकता है।
    6. आंखों में जलन, लगातार खांसी, सांस लेने में परेशानी या सीने में तकलीफ होने पर डॉक्टर से सलाह लें।

    सिर्फ पौधे लगाने, तुलसी, गुड़ या गर्म पानी का सेवन करने से PM2.5 के नुकसान से बचाव नहीं होता। प्रदूषण के दौरान सबसे जरूरी है कि जहरीली हवा के संपर्क को कम किया जाए और जरूरत पड़ने पर चिकित्सकीय सलाह ली जाए।

    दिल्ली में बढ़ता प्रदूषण अब केवल पर्यावरण का मुद्दा नहीं, बल्कि सार्वजनिक स्वास्थ्य की बड़ी चुनौती बन चुका है। ऐसे में प्रदूषण के स्रोतों पर नियंत्रण के साथ-साथ लोगों के लिए सही जानकारी और बचाव के उपाय अपनाना भी बेहद जरूरी है।

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