Last updated: November 3rd, 2026 at 01:25 pm

बिहार में 125 यूनिट मुफ्त बिजली की योजना को लेकर राजनीतिक बहस तेज हो गई है। मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी की ओर से आर्थिक रूप से संपन्न और आयकर देने वाले लोगों से मुफ्त बिजली का लाभ स्वेच्छा से छोड़ने की अपील किए जाने के बाद सत्ता पक्ष और विपक्ष आमने-सामने आ गए हैं। राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) के सहयोगी दलों ने मुख्यमंत्री की इस पहल का समर्थन किया है, जबकि राष्ट्रीय जनता दल (RJD) ने सरकार की आर्थिक स्थिति और उसकी नीतियों पर सवाल उठाए हैं।
मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने एक नवंबर को पटना में आयोजित दो दिवसीय पाटलिपुत्र राष्ट्रीय युवा संसद-2.0 के दौरान यह अपील की थी। उन्होंने कहा था कि राज्य में आर्थिक रूप से सक्षम और आयकर देने वाले लोग स्वेच्छा से 125 यूनिट मुफ्त बिजली का लाभ छोड़कर बिहार के विकास में योगदान दे सकते हैं। मुख्यमंत्री के मुताबिक, राज्य सरकार बिजली सब्सिडी पर सालाना लगभग 23 हजार करोड़ रुपये खर्च कर रही है। उन्होंने प्रति परिवार इस सब्सिडी का वार्षिक खर्च करीब 8 हजार से 10 हजार रुपये बताया।
मुख्यमंत्री की इस अपील के बाद बिहार की राजनीति में नई बहस शुरू हो गई। विपक्ष ने इसे केवल संपन्न लोगों से सब्सिडी छोड़ने का अनुरोध मानने के बजाय सरकार की आर्थिक प्राथमिकताओं से जोड़कर सवाल उठाए। RJD ने आरोप लगाया कि सरकार ने मुफ्त बिजली की सुविधा शुरू तो कर दी, लेकिन अब इसके खर्च को लेकर लोगों से लाभ छोड़ने की अपील की जा रही है। विपक्ष का सवाल है कि यदि योजना राज्य के लिए इतनी बड़ी वित्तीय जिम्मेदारी बन रही है, तो सरकार को अपनी आर्थिक नीति और खर्च की प्राथमिकताओं पर भी जवाब देना चाहिए।
वहीं, NDA के सहयोगी दलों ने मुख्यमंत्री के बयान का समर्थन किया है। जनता दल यूनाइटेड के प्रवक्ता नवल शर्मा ने इसे राज्यहित में उठाया गया कदम बताया। उनका कहना है कि आर्थिक रूप से संपन्न लोगों को सब्सिडी की आवश्यकता नहीं है और यदि वे स्वेच्छा से इसका लाभ छोड़ते हैं, तो उपलब्ध संसाधनों का इस्तेमाल गरीब और जरूरतमंद परिवारों के हित में किया जा सकता है।
भारतीय जनता पार्टी और हिंदुस्तानी अवाम मोर्चा की ओर से भी मुख्यमंत्री की अपील को सकारात्मक बताया गया। NDA नेताओं का तर्क है कि मुख्यमंत्री ने किसी पर मुफ्त बिजली छोड़ने का दबाव नहीं बनाया है, बल्कि सक्षम लोगों से स्वेच्छा से आगे आने का आग्रह किया है। उनका कहना है कि सरकारी संसाधनों का उपयोग जरूरतमंद वर्गों तक अधिक प्रभावी तरीके से पहुंचाने के लिए ऐसे प्रयास उपयोगी हो सकते हैं।
केंद्रीय मंत्री और लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) के प्रमुख चिराग पासवान ने भी मुख्यमंत्री की अपील का समर्थन किया है। उन्होंने कहा कि बिहार को विकास के रास्ते पर आगे बढ़ाने के लिए राजस्व के स्रोत मजबूत करना जरूरी है। चिराग के मुताबिक, मुख्यमंत्री ने एक विचार लोगों के सामने रखा है और इसे अनिवार्य व्यवस्था के बजाय स्वैच्छिक अपील के रूप में देखा जाना चाहिए। उन्होंने इस पहल को राज्य के भविष्य और विकास के लिए संसाधन जुटाने से जुड़ा विषय बताया।
इस पूरे विवाद के बीच यह स्पष्ट करना जरूरी है कि मुख्यमंत्री ने फिलहाल सभी उपभोक्ताओं के लिए 125 यूनिट मुफ्त बिजली की सुविधा समाप्त करने की घोषणा नहीं की है। उनकी अपील विशेष रूप से आर्थिक रूप से सक्षम और आयकर देने वाले परिवारों से है, ताकि वे अपनी इच्छा से इस लाभ को छोड़ सकें। इसलिए इसे योजना बंद होने के फैसले के रूप में देखना सही नहीं होगा।
बिहार में 125 यूनिट मुफ्त बिजली की सुविधा का मुद्दा आम उपभोक्ताओं के लिए भी महत्वपूर्ण है। राज्य में बड़ी संख्या में परिवारों के घरेलू बिजली खर्च पर इस योजना का असर पड़ता है। ऐसे में सरकार के सामने एक तरफ उपभोक्ताओं को राहत देने और दूसरी तरफ बिजली सब्सिडी के वित्तीय बोझ को संभालने की चुनौती है।
इस मुद्दे पर राजनीतिक बहस के साथ-साथ यह भी देखना होगा कि मुख्यमंत्री की अपील को कितने संपन्न परिवार स्वीकार करते हैं और सरकार इस योजना से जुड़े खर्च तथा भविष्य की वित्तीय व्यवस्था को लेकर क्या कदम उठाती है। फिलहाल मुफ्त बिजली को लेकर सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच बयानबाजी जारी है और यह मुद्दा बिहार की राजनीति में चर्चा का विषय बना हुआ है।
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