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सहारनपुर गैंगरेप केस में 11 साल बाद पीड़िता को न्याय, 500 से अधिक तारीखों और 8 गवाहों के बाद दो पुलिसकर्मियों को 20-20 साल की सजा

  उत्तर प्रदेश के सहारनपुर जिले में वर्ष 2015 के देवबंद सामूहिक दुष्कर्म मामले में अदालत ने दो पुलिसकर्मियों को
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    उत्तर प्रदेश के सहारनपुर जिले में वर्ष 2015 के देवबंद सामूहिक दुष्कर्म मामले में अदालत ने दो पुलिसकर्मियों को 20-20 साल के कठोर कारावास की सजा सुनाई है। करीब 11 साल तक चली कानूनी लड़ाई, 500 से अधिक अदालती तारीखों और आठ गवाहों के बयान दर्ज होने के बाद पीड़िता को न्याय मिला है। फास्ट ट्रैक कोर्ट-द्वितीय ने तत्कालीन थाना प्रभारी बृजमोहन यादव और उपनिरीक्षक वेगपाल सिंह को दोषी ठहराते हुए प्रत्येक पर 1.20 लाख रुपये का जुर्माना भी लगाया है।

     

    यह मामला 6 अगस्त 2015 का है। आरोप के मुताबिक, देवबंद पुलिस ने पीड़िता के पति को एक आपराधिक मामले में गिरफ्तार किया था। इसके बाद उसकी पत्नी अपने परिवार की एक महिला सदस्य के साथ पति के बारे में जानकारी लेने थाने पहुंची थी। उस समय महिला करीब ढाई महीने की गर्भवती थी। आरोप है कि थाने में मौजूद पुलिसकर्मी उसे तत्कालीन थाना प्रभारी के सरकारी आवास पर ले गए, जहां चार पुलिसकर्मियों ने उसके साथ सामूहिक दुष्कर्म किया। पीड़िता की मदद करने की कोशिश करने वाली उसकी रिश्तेदार के साथ मारपीट किए जाने का आरोप भी लगाया गया था।

     

    घटना के बाद पीड़िता ने स्थानीय पुलिस अधिकारियों से शिकायत की, लेकिन शुरुआत में उसकी प्राथमिकी दर्ज नहीं की गई। उसने वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों तक अपनी बात पहुंचाई, लेकिन वहां से भी कार्रवाई नहीं हुई। इसके बाद पीड़िता ने इलाहाबाद हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। लंबी कानूनी प्रक्रिया के बाद हाईकोर्ट के निर्देश पर वर्ष 2017 में मामला दर्ज करने का आदेश दिया गया और जांच शुरू हुई।

     

    मामले की जांच अपराध शाखा अपराध अनुसंधान विभाग यानी सीबीसीआईडी को सौंपी गई थी। जांच एजेंसी ने बाद में आरोपों को पर्याप्त आधार न मिलने की बात कहते हुए अदालत में अंतिम रिपोर्ट दाखिल कर दी। हालांकि, पीड़िता ने इस रिपोर्ट को स्वीकार नहीं किया और अदालत में विरोध याचिका दाखिल कर अपनी लड़ाई जारी रखी। अदालत ने उसकी आपत्ति पर विचार करते हुए आरोपियों को तलब किया और मामले की सुनवाई आगे बढ़ी।

     

    इस मुकदमे में कुल चार पुलिसकर्मियों के नाम सामने आए थे। इनमें तत्कालीन थाना प्रभारी बृजमोहन यादव, उपनिरीक्षक वेगपाल सिंह, चौकी प्रभारी पंकज धामा और एक अन्य कांस्टेबल शामिल थे। हालांकि, पंकज धामा के मामले की कार्यवाही अलग कर दी गई, जबकि चौथे आरोपी की पहचान और तलाश नहीं हो सकी। फिलहाल अदालत में सुनवाई बृजमोहन यादव और वेगपाल सिंह के खिलाफ चली।

     

    मुकदमे की सुनवाई के दौरान आठ गवाहों के बयान दर्ज किए गए। पीड़िता और उसके परिवार को लगातार कानूनी प्रक्रिया से गुजरना पड़ा। पीड़िता के वकील के अनुसार, इस दौरान परिवार को धमकियों और परेशानियों का भी सामना करना पड़ा। इसके बावजूद पीड़िता ने अपना मुकदमा वापस नहीं लिया और अदालत में न्याय की मांग करती रही।

     

    अदालत ने पहले दोनों पुलिसकर्मियों को दोषी करार दिया और इसके बाद सजा के सवाल पर सुनवाई की। बचाव पक्ष ने आरोपियों की उम्र और पारिवारिक जिम्मेदारियों का हवाला देते हुए कम सजा देने की मांग की। वहीं, अभियोजन पक्ष ने कहा कि लोकसेवक के पद पर रहते हुए थाने में इस तरह का अपराध करना गंभीर मामला है और दोषियों को कड़ी सजा मिलनी चाहिए। दोनों पक्षों की दलीलें सुनने और उपलब्ध साक्ष्यों पर विचार करने के बाद अदालत ने 20-20 साल के कठोर कारावास का फैसला सुनाया।

     

    अदालत ने प्रत्येक दोषी पर कुल 1.20 लाख रुपये का जुर्माना लगाया है। इसमें सामूहिक दुष्कर्म के अपराध के लिए एक लाख रुपये और आपराधिक धमकी के मामले में 20 हजार रुपये शामिल हैं। अदालत ने जुर्माने की राशि में से निर्धारित हिस्सा पीड़िता को देने और उसे सरकारी पीड़ित मुआवजा योजना के तहत आर्थिक सहायता उपलब्ध कराने के निर्देश भी दिए हैं।

     

    फैसले के बाद पीड़िता ने राहत जताते हुए कहा कि उसे न्याय मिलने में साढ़े 11 साल लग गए, लेकिन अदालत के फैसले से उसका भरोसा मजबूत हुआ है। यह मामला पुलिस व्यवस्था में जवाबदेही, महिलाओं की सुरक्षा और न्याय पाने के लिए लंबी कानूनी लड़ाई लड़ने वाली पीड़िताओं की चुनौतियों को फिर से सामने लाता है।

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