नईदिल्ली: सुप्रीम कोर्ट का ताज़ा फैसला झारखंड सरकार के लिए बड़ी चुनौती बनकर सामने आया है। अदालत ने साफ कहा है कि नदियों से बालू उत्खनन तभी संभव होगा जब पर्यावरण प्रभाव आकलन , वैज्ञानिक ‘पुनःपूर्ति अध्ययन’ ( रिप्लेनिश्मेन्ट स्टडी) और ग्रामसभा की सहमति पूरी तरह से ली जाए। बिना इन प्रक्रियाओं के राज्य सरकार की नीलामी व्यवस्था कानूनी रूप से मान्य नहीं होगी।झारखंड सरकार हर साल अलग-अलग जिलों में बालू घाटों की नीलामी करती रही है। इससे सरकार को अरबों रुपये का राजस्व मिलता है। लेकिन सुप्रीम कोर्ट के इस आदेश के बाद मौजूदा नीलामी प्रक्रिया पर रोक लग सकती है। विशेषज्ञों का कहना है कि इससे जहां निर्माण कार्य रुकावट झेलेंगे, वहीं बालू की कमी और अवैध खनन की समस्या और गंभीर हो सकती है। पलामू, गढ़वा और लातेहार जिलों में हर साल दर्जनों घाटों से लाखों क्यूबिक फीट बालू निकाला जाता है। यह इलाका रांची, डाल्टनगंज और औरंगाबाद तक के निर्माण कार्यों की आपूर्ति करता है। सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद यहां के बालू घाटों की नीलामी अटक सकती है, जिससे स्थानीय मजदूरों और ट्रांसपोर्ट व्यवसायियों पर सीधा असर होगा। सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा है कि डिस्ट्रिक्ट सर्वे रिपोर्ट (डीएसआर) तब तक कानूनी रूप से मान्य नहीं होगी जब तक उसमें नदी की प्राकृतिक पुनर्प्राप्ति क्षमता का वैज्ञानिक विश्लेषण शामिल न हो। कोर्ट ने टिप्पणी की कि वन संरक्षण में वृक्षों की वृद्धि दर का आंकलन जरूरी होता है ताकि कटाई उस वृद्धि से अधिक न हो, वैसे ही नदी तल से बालू निकालने से पहले यह आकलन होना चाहिए कि नदी अपनी रेत की मात्रा को कितनी जल्दी भर सकती है, ताकि पारिस्थितिकी संतुलन न बिगड़े । इस आधार पर सुप्रीम कोर्ट ने जम्मू-कश्मीर के तहनाया (शालिगंग नाला) से जुड़ी सड़क निर्माण परियोजना मामले में नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल द्वारा रद्द की गई पर्यावरणीय मंजूरी को सही ठहराया और संबंधित अपीलों को खारिज कर दिया।झारखंड में दर्जनों नदियों से हर साल करोड़ों टन बालू का उत्खनन होता है। अब बिना वैज्ञानिक अध्ययन और पर्यावरणीय मंजूरी के कोई भी खनन संभव नहीं होगा। इससे राज्य सरकार के राजस्व पर असर पड़ेगा, निर्माण कार्य धीमे पड़ेंगे और बाजार में बालू की किल्लत से दाम बढ़ सकते हैं।

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