Last updated: December 18th, 2025 at 05:03 pm

पश्चिमी उत्तर प्रदेश के कई जिलों में हाई कोर्ट बेंच की मांग को लेकर व्यापक समर्थन प्रदर्शन देखने को मिला। इस आंदोलन में स्थानीय लोगों, वकीलों और छात्र संगठनों ने भाग लिया। प्रदर्शनकारियों ने अपने-अपने जिलों में स्कूल, कॉलेज और बाजार बंद रखने की अपील की और इसे लागू भी किया।
इस आंदोलन का मुख्य उद्देश्य यह है कि पश्चिमी यूपी के लोगों को न्यायिक सुविधाओं के लिए लंबा सफर न करना पड़े। वर्तमान में, राज्य का उच्च न्यायालय लखनऊ में स्थित है, जिससे पश्चिमी जिलों के लोग अपनी अदालत तक पहुंचने के लिए कई घंटों की यात्रा करते हैं। लोगों का कहना है कि हाई कोर्ट की स्थानीय बेंच बनने से न्याय प्रक्रिया तेज और सरल होगी।
राजनीतिक दलों ने भी इस मुद्दे को समर्थन दिया। विपक्ष और कुछ स्थानीय नेताओं ने आंदोलनकारियों के साथ मिलकर सरकार पर दबाव बनाने की कोशिश की। उनका कहना है कि न्यायिक बेंच की स्थापना से क्षेत्रीय असमानता कम होगी और लोगों को अपने अधिकारों की रक्षा में आसानी होगी।
सरकारी अधिकारी और प्रशासनिक विभाग इस प्रदर्शन पर नजर रख रहे हैं। उन्होंने कहा कि शांतिपूर्ण प्रदर्शन की अनुमति दी गई है, लेकिन किसी भी प्रकार की हिंसा या कानून-व्यवस्था की समस्या को तुरंत नियंत्रित किया जाएगा। पुलिस बल और सुरक्षा अधिकारी शहर और कस्बों में तैनात किए गए हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि हाई कोर्ट की बेंच की मांग न्यायिक सुधार की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। इससे न्याय तक पहुंच को सरल और तेज़ बनाया जा सकता है, खासकर ग्रामीण और दूर-दराज़ इलाकों में रहने वाले लोगों के लिए।
इस आंदोलन से यह भी स्पष्ट हो गया है कि पश्चिमी यूपी के नागरिक न्याय प्रणाली में सुधार चाहते हैं और अपने क्षेत्र के लिए न्यायिक सुविधाओं का विस्तार चाहते हैं। राजनीतिक पार्टियों के लिए भी यह एक मौका है कि वे इस मुद्दे पर अपनी सक्रियता दिखाएं और जनता के समर्थन को अपने पक्ष में बदलें।
आंदोलन का असर प्रशासन पर भी दिखाई दे रहा है। कई जिलों में सरकारी कार्यालयों और शैक्षिक संस्थानों ने इस प्रदर्शन के चलते अपनी गतिविधियों को कुछ समय के लिए स्थगित किया। व्यापारिक संगठनों ने भी मांग के समर्थन में अपनी दुकानें बंद रखीं।
कुल मिलाकर, पश्चिम यूपी में हाई कोर्ट बेंच की मांग पर चल रहे प्रदर्शन ने राजनीतिक, सामाजिक और प्रशासनिक स्तर पर महत्वपूर्ण प्रभाव डाला है। यह आंदोलन न्यायिक सुधार की दिशा में एक बड़ा कदम साबित हो सकता है और आने वाले समय में इस पर राजनीतिक और कानूनी फैसले सामने आने की संभावना है।
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