Last updated: January 1st, 2026 at 05:58 pm

नई दिल्ली/कोलकाता: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से कांग्रेस नेता अधीर रंजन चौधरी की हालिया मुलाकात को केवल औपचारिक भेंट मानकर नहीं देखा जा रहा है। पश्चिम बंगाल में अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव से पहले इस मुलाकात के राजनीतिक मायने निकाले जा रहे हैं। खास बात यह रही कि अधीर रंजन चौधरी ने प्रधानमंत्री के सामने बांग्ला भाषी लोगों पर कथित उत्पीड़न का संवेदनशील मुद्दा उठाया।
अधीर रंजन चौधरी ने आरोप लगाया कि देश के कुछ हिस्सों, खासकर भाजपा शासित राज्यों में, सिर्फ बांग्ला भाषा बोलने की वजह से लोगों को शक की नजर से देखा जा रहा है। उन्होंने कहा कि कई मामलों में बांग्ला भाषी नागरिकों को बांग्लादेशी या घुसपैठिया समझकर परेशान किया जा रहा है, जो बेहद चिंताजनक है।
कांग्रेस नेता ने प्रधानमंत्री को लिखे पत्र में कहा कि बांग्ला बोलना अब कुछ जगहों पर “अपराध” जैसा बनता जा रहा है। इससे न केवल आम नागरिकों की सुरक्षा खतरे में पड़ रही है, बल्कि सामाजिक सौहार्द और आपसी विश्वास भी कमजोर हो रहा है। उन्होंने चेतावनी दी कि ऐसी घटनाएं आगे चलकर सांप्रदायिक तनाव और हिंसा को जन्म दे सकती हैं।
अधीर रंजन चौधरी ने कहा कि पश्चिम बंगाल की सीमा बांग्लादेश से लगती है और राज्य में मुस्लिम आबादी भी बड़ी संख्या में है। ऐसे में अन्य राज्यों में बांग्ला भाषी लोगों के साथ हो रही घटनाओं का असर बंगाल के सामाजिक ताने-बाने पर भी पड़ सकता है।
उन्होंने हाल की घटनाओं का जिक्र करते हुए बताया कि ओडिशा के संबलपुर में पश्चिम बंगाल के मुर्शिदाबाद जिले के 30 वर्षीय प्रवासी मजदूर ज्वेल राणा की हत्या कर दी गई। वहीं मुंबई में भी दो प्रवासी मजदूरों को सिर्फ बांग्लादेशी होने के शक में गिरफ्तार किया गया, जिसने पहचान जांच की प्रक्रिया पर सवाल खड़े कर दिए हैं।
पश्चिम बंगाल प्रवासी कल्याण बोर्ड के आंकड़ों का हवाला देते हुए अधीर रंजन ने कहा कि पिछले 10 महीनों में भाजपा शासित राज्यों से उत्पीड़न से जुड़ी 1143 शिकायतें दर्ज की गई हैं। इनमें मारपीट, हिरासत, धमकी और पहचान को लेकर परेशान किए जाने के मामले शामिल हैं।
अधीर रंजन चौधरी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से आग्रह किया कि वे सभी राज्य सरकारों को इस मुद्दे पर संवेदनशील बनाएं और यह सुनिश्चित करें कि किसी भी भारतीय नागरिक के साथ भाषा, धर्म या पहचान के आधार पर भेदभाव न हो।
अब बड़ा सवाल यह है कि
क्या भाषा किसी की देशभक्ति तय करेगी?
और क्या आने वाले बंगाल विधानसभा चुनावों में यह मुद्दा एक बड़ा राजनीतिक हथियार बनेगा?
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