Last updated: January 7th, 2026 at 12:52 pm

दिल्ली विधानसभा में हाल ही में एक बार फिर हंगामा देखने को मिला। इस बार मामला शराब नीति और अन्य सरकारी नीतियों को लेकर सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच तीखी बहस का था। दोनों पक्षों के नेताओं ने सदन में एक-दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप लगाए और कार्यवाही कई बार बाधित हो गई।
शराब नीति पर विपक्ष का आरोप था कि सरकार ने इस नीति को पारदर्शी तरीके से लागू नहीं किया और आम जनता को इसका लाभ नहीं मिल रहा। विपक्ष ने कहा कि नई नीति के कारण छोटे दुकानदार और आम नागरिक परेशान हैं। वहीं, सत्ता पक्ष ने इस आरोप को नकारते हुए कहा कि नीति का उद्देश्य सार्वजनिक स्वास्थ्य और सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए लागू किया गया है।
सदन में चर्चा के दौरान विपक्ष ने कई बार सरकार को घेरा और इसके विरोध में नारे लगाए। इस पर सत्ता पक्ष के नेता भी कड़ी प्रतिक्रिया देने लगे। बहस इतनी गर्म हो गई कि सभापति को सदन को नियंत्रित करने के लिए कई बार बैठक स्थगित करनी पड़ी। अधिकारियों ने कहा कि सदन में दोनों पक्षों को अपनी बात रखने का पूरा हक है, लेकिन यह शांति और नियमों के भीतर होना चाहिए।
शराब नीति के अलावा कुछ अन्य मुद्दों पर भी विवाद हुआ। विपक्ष ने स्वास्थ्य, शिक्षा और कानून व्यवस्था से जुड़े मुद्दों को उठाया और आरोप लगाया कि सरकार ने इन मामलों में पूरी तरह से सुधार नहीं किया। सत्ता पक्ष ने विपक्ष की आलोचना को निराधार बताते हुए कहा कि उनके द्वारा शुरू की गई कई योजनाएँ जनता के लिए लाभकारी साबित हो रही हैं।
हंगामे के दौरान कई बार सदन में शोर बढ़ गया और सदन की सामान्य कार्यवाही बाधित हो गई। सभापति ने दोनों पक्षों को शांति बनाए रखने और मुद्दों पर अनुशासित ढंग से चर्चा करने का निर्देश दिया। उन्होंने यह भी कहा कि सदन में बहस का मकसद समस्याओं का समाधान करना होना चाहिए, न कि केवल आरोप-प्रत्यारोप करना।
राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि दिल्ली विधानसभा में इस तरह की बहस और हंगामा आम बात है, लेकिन यह दर्शाता है कि विपक्ष सरकार की नीतियों पर नजर रख रहा है और जनता की समस्याओं को सामने ला रहा है। वहीं, सत्ता पक्ष को भी जनता के हितों को ध्यान में रखते हुए नीति निर्माण और कार्यान्वयन करना जरूरी है।
कुल मिलाकर, दिल्ली विधानसभा में शराब नीति और अन्य मुद्दों पर हुआ हंगामा यह दिखाता है कि राजनीतिक विवाद और बहस लोकतंत्र का हिस्सा हैं। हालांकि हंगामा कभी-कभी कार्यवाही में रुकावट डाल देता है, लेकिन इससे जनता और सरकार के बीच संवाद की जरूरत भी उजागर होती है। आगामी दिनों में सदन में इन मुद्दों पर और चर्चा होने की उम्मीद है, जिससे नीति सुधार और समाधान की दिशा में कदम उठाए जा सकें।
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