
उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक बार फिर जातीय संतुलन और सम्मान का सवाल केंद्र में आ गया है. भारतीय जनता पार्टी के भीतर ब्राह्मण नेताओं को लेकर उठी हलचल अब खुले विवाद का रूप लेती दिख रही है. कुशीनगर में बीजेपी के ब्राह्मण विधायकों की बैठक से शुरू हुआ यह मामला अब गोरखपुर की एक वायरल तस्वीर और वीडियो तक पहुंच गया है, जिसने पार्टी नेतृत्व को असहज स्थिति में ला खड़ा किया है.
ब्राह्मण विधायकों की बैठक और चेतावनी
कुशीनगर के विधायक पीएन पाठक के सरकारी आवास पर ब्राह्मण विधायकों की बैठक को पार्टी के भीतर असंतोष की पहली सार्वजनिक झलक माना गया. बैठक की खबर सामने आते ही बीजेपी के नए प्रदेश अध्यक्ष पंकज चौधरी की सख्त प्रतिक्रिया आई. उन्होंने न सिर्फ इस तरह की बैठकों पर सवाल उठाए, बल्कि विधायकों को अनुशासन का पाठ भी पढ़ाया. यहीं से यह धारणा बनने लगी कि पार्टी नेतृत्व ब्राह्मण नेताओं की आवाज को दबाने की कोशिश कर रहा है.
गोरखपुर की घटना और वायरल वीडियो
इस पूरे विवाद को और हवा तब मिली, जब पंकज चौधरी गोरखपुर के एक कार्यक्रम में पहुंचे. इसी दौरान बस्ती के पूर्व सांसद और वरिष्ठ ब्राह्मण नेता हरीश द्विवेदी उनका स्वागत करने के लिए फूल-माला लेकर आगे बढ़े. सोशल मीडिया पर वायरल वीडियो में दावा किया गया कि प्रदेश अध्यक्ष ने उनके हाथों से माला स्वीकार नहीं की. इतना ही नहीं, यह भी आरोप लगे कि वहां मौजूद बाउंसर्स ने पूर्व सांसद के साथ धक्का-मुक्की की.
क्या यह सिर्फ प्रोटोकॉल था या अपमान?
बीजेपी समर्थकों का एक वर्ग इसे प्रोटोकॉल या भीड़ प्रबंधन से जोड़कर देख रहा है, लेकिन सवाल यह है कि क्या हजारों कार्यकर्ताओं के सामने एक वरिष्ठ नेता के साथ ऐसा व्यवहार उचित था? राजनीति में प्रतीकों का बड़ा महत्व होता है और माला न पहनना कई बार व्यक्तिगत अपमान के रूप में देखा जाता है. यही वजह है कि यह मामला सिर्फ एक घटना नहीं रह गया, बल्कि भावनात्मक मुद्दा बन गया.
सोशल मीडिया पर गुस्से की लहर
घटना के बाद X और फेसबुक पर प्रतिक्रियाओं की बाढ़ आ गई. कई यूजर्स ने इसे बीजेपी का अहंकार बताया तो कुछ ने सीधे तौर पर ब्राह्मण समाज को नजरअंदाज करने का आरोप लगाया. “बीजेपी को लगता है ब्राह्मण वोट बैंक उसका गुलाम है” जैसे कमेंट्स ने साफ कर दिया कि मामला अब पार्टी के भीतर सीमित नहीं रहा.
सियासी समीकरण और बढ़ती चिंता
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यूपी में बीजेपी की चुनावी सफलता में ब्राह्मण और कुर्मी दोनों समुदायों की अहम भूमिका रही है. अगर किसी एक वर्ग में यह भावना गहराती है कि उन्हें सम्मान नहीं मिल रहा, तो इसका असर चुनावी गणित पर पड़ सकता है. फिलहाल पार्टी की ओर से कोई स्पष्ट सफाई नहीं आई है, लेकिन चुप्पी भी कई सवाल खड़े कर रही है.
अंततः सवाल यही है कि क्या यह विवाद समय रहते संभाला जाएगा या फिर यह असंतोष आने वाले चुनावों में बीजेपी के लिए चुनौती बन सकता है.
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