
प्रयागराज के संगम तट पर आयोजित माघ मेले का सबसे पावन पर्व मौनी अमावस्या, जो आस्था और साधना का प्रतीक माना जाता है, इस बार विवाद और तनाव की वजह से चर्चा में आ गया। साधु-संतों, श्रद्धालुओं और अखाड़ों की मौजूदगी के बीच उस समय हड़कंप मच गया जब ज्योतिष पीठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती ने पवित्र स्नान करने से इनकार कर दिया और अपनी पालकी वापस लौटा दी।
स्नान से पहले ही बिगड़ा माहौल
घटना उस वक्त हुई जब शंकराचार्य का काफिला संगम में स्नान के लिए आगे बढ़ रहा था। इसी दौरान प्रशासन और शंकराचार्य के शिष्यों के बीच कथित तौर पर तीखी नोकझोंक हो गई। आरोप है कि स्थिति इतनी बिगड़ गई कि धक्का-मुक्की और मारपीट तक की नौबत आ गई। मौनी अमावस्या जैसे पवित्र अवसर पर इस तरह की घटना ने वहां मौजूद श्रद्धालुओं को भी स्तब्ध कर दिया।
प्रशासन पर संतों से बदसलूकी का आरोप
शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद ने बेहद भावुक और कठोर शब्दों में प्रशासन पर आरोप लगाए। उन्होंने कहा कि उनकी आंखों के सामने वरिष्ठ अधिकारियों ने संतों और शिष्यों के साथ हाथापाई की, उन्हें धक्का देकर गिराया गया और थप्पड़ तक मारे गए। शंकराचार्य के अनुसार, ऐसे दृश्य को देखकर उन्होंने यह फैसला लिया कि वह स्नान नहीं करेंगे और तुरंत वापस लौट जाएंगे। उनका कहना था कि जब संतों का सम्मान सुरक्षित नहीं है, तो वहां रुकना उचित नहीं।
होम सेक्रेटरी मोहित गुप्ता पर लगे आरोप
इस पूरे मामले में सबसे गंभीर आरोप यूपी सरकार के होम सेक्रेटरी मोहित गुप्ता पर लगे हैं। शंकराचार्य पक्ष का दावा है कि उनके काफिले में शामिल शिष्यों के साथ धक्का-मुक्की और मारपीट की शुरुआत उन्हीं के स्तर से हुई। हालांकि, प्रशासन की ओर से इस मामले पर आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने आना अभी बाकी है, लेकिन घटना ने सरकार और प्रशासन की भूमिका पर सवाल जरूर खड़े कर दिए हैं।
कौन हैं मोहित गुप्ता
यूपी पुलिस की आधिकारिक जानकारी के अनुसार, मोहित गुप्ता 2006 बैच के आईपीएस अधिकारी हैं। 17 जुलाई 1981 को जन्मे मोहित गुप्ता मूल रूप से दिल्ली के रहने वाले हैं। उन्होंने कंप्यूटर साइंस में बीई की पढ़ाई की है और लंबे समय से प्रशासनिक जिम्मेदारियों में सक्रिय हैं। ऐसे वरिष्ठ अधिकारी पर इस तरह के आरोप लगना, अपने आप में गंभीर मामला माना जा रहा है।
आस्था बनाम व्यवस्था की टकराहट
यह पूरा घटनाक्रम एक बार फिर यह सवाल खड़ा करता है कि धार्मिक आयोजनों में व्यवस्था और आस्था के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए। माघ मेला जैसे आयोजन न सिर्फ धार्मिक, बल्कि सामाजिक सौहार्द के भी प्रतीक होते हैं। ऐसे में संतों और प्रशासन के बीच टकराव की तस्वीर सामने आना, पूरे आयोजन की गरिमा पर असर डालता है।
फिलहाल, इस मामले ने सियासी और सामाजिक हलकों में बहस तेज कर दी है। अब सबकी नजर इस बात पर है कि प्रशासन इन आरोपों पर क्या सफाई देता है और भविष्य में ऐसे पवित्र आयोजनों में ऐसी स्थिति दोबारा न बने, इसके लिए क्या कदम उठाए जाते हैं।
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