
प्रयागराज के माघ मेले में इस बार आस्था का संगम विवाद में बदल गया है। ज्योतिर्मठ पीठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती और मेला प्रशासन के बीच टकराव अब सिर्फ स्नान तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह पहचान, अधिकार और कानून की व्याख्या तक पहुंच गया है। मौनी अमावस्या जैसे पवित्र पर्व पर शुरू हुआ यह विवाद अब नोटिस, बयानबाज़ी और आमरण अनशन की शक्ल ले चुका है।
मौनी अमावस्या पर क्या हुआ?
रविवार को मौनी अमावस्या के अवसर पर स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद अपने अनुयायियों के साथ गंगा स्नान के लिए निकले थे। आरोप है कि पुलिस ने उन्हें और उनके समर्थकों को संगम क्षेत्र में आगे बढ़ने से रोका और इस दौरान मारपीट भी हुई। स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद का कहना है कि संतों के साथ ऐसा व्यवहार न सिर्फ आस्था का अपमान है, बल्कि सनातन परंपराओं पर भी चोट है। इसी के विरोध में उन्होंने अपने शिविर के बाहर अन्न-जल त्याग कर धरना शुरू कर दिया और मेला प्रशासन से सार्वजनिक माफी की मांग की।
नोटिस से बढ़ा विवाद
मामला तब और गंभीर हो गया जब प्रयागराज मेला प्राधिकरण ने स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद को नोटिस जारी कर दिया। नोटिस में पूछा गया है कि वह खुद को ज्योतिष पीठ का शंकराचार्य कैसे कह रहे हैं, जबकि इस पद को लेकर सुप्रीम कोर्ट में मामला लंबित है। प्रशासन का कहना है कि जब तक अदालत का अंतिम फैसला नहीं आ जाता, तब तक कोई भी व्यक्ति कानूनी रूप से इस पद का दावा नहीं कर सकता।
स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद का जवाब
इस नोटिस पर स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने तीखी प्रतिक्रिया दी। उनका कहना है कि शंकराचार्य कौन होगा, यह निर्णय प्रशासन, मुख्यमंत्री या राष्ट्रपति नहीं कर सकते। उनके अनुसार शंकराचार्य की मान्यता केवल अन्य पीठों के शंकराचार्य तय करते हैं और उनमें से दो पीठ उन्हें शंकराचार्य मान चुकी हैं। उनका सवाल सीधा है“क्या अब सरकार तय करेगी कि धर्म में कौन क्या है?”
पट्टाभिषेक और कानूनी पेच
नोटिस में जिस ‘पट्टाभिषेक’ का जिक्र है, उसका अर्थ है किसी पीठ पर विधिवत ताजपोशी। प्रशासन का तर्क है कि सुप्रीम कोर्ट ने 2022 में आदेश दिया था कि अपील के निपटारे तक किसी भी तरह का पट्टाभिषेक नहीं होगा। इसी आधार पर यह आपत्ति जताई गई है कि शिविर में लगे बोर्ड पर खुद को शंकराचार्य लिखना अदालत के आदेश की अवहेलना हो सकती है।
प्रशासन और समर्थकों के दावे
जहां एक ओर प्रशासन का कहना है कि किसी को स्नान से नहीं रोका गया और सुरक्षा कारणों से सख्ती जरूरी थी, वहीं दूसरी ओर स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद के समर्थकों का आरोप है कि पुलिस की कार्रवाई में करीब 15 लोग घायल हुए हैं। FIR की तैयारी की बात भी सामने आ रही है।
यह पूरा विवाद एक बड़े सवाल की ओर इशारा करता है क्या आस्था की पहचान अदालत तय करेगी या परंपरा? माघ मेले की यह घटना अब सिर्फ स्थानीय मामला नहीं रही, बल्कि धर्म और कानून के रिश्ते पर एक नई बहस छेड़ चुकी है।
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