Screenshotआरक्षण पर बहस भारत में कभी थमती नहीं है। लेकिन हालिया बयान “जिस घर में सरकारी नौकरी हो, उसका आरक्षण खत्म होनाचाहिए, चाहे वो किसी भी जाति से हो”ने इस चर्चा को एक नई दिशा दी है। यह बयान सीधे उस सवाल से टकराता है, जिससे अब तक नीति निर्माता और समाज दोनों बचते रहे हैं: क्या आरक्षण हमेशा के लिए है, या जरूरत पूरी होने पर उसे छोड़ देना चाहिए?
आरक्षण का मकसद: शुरुआत कहां से हुई
भारतीय संविधान ने आरक्षण को सामाजिक न्याय का औजार माना। अनुच्छेद 15 और 16 के तहत SC/ST को 22.5 प्रतिशत और OBC को 27 प्रतिशत आरक्षण दिया गया, ताकि सदियों के भेदभाव से दबे वर्ग मुख्यधारा में आ सकें। इंदिरा साहनी केस में सुप्रीम कोर्ट ने 50 प्रतिशत की सीमा तय कर यह साफ किया कि आरक्षण अपवाद है, नियम नहीं। मकसद था बराबरी की लाइन तक लाना, स्थायी सहारा बनाना नहीं।
जब लाभ पीढ़ी-दर-पीढ़ी मिलने लगे
आज सवाल यह है कि क्या आरक्षण का लाभ सही लोगों तक पहुंच रहा है? कई उदाहरण सामने आते हैं, जहां एक ही परिवार की दूसरी या तीसरी पीढ़ी भी आरक्षण के जरिए सरकारी सेवा में पहुंच रही है। अगर किसी घर में पहले से IAS, IPS या ग्रुप-A अफसर हैं, तो क्या उस परिवार को अब भी वही सामाजिक पिछड़ापन झेलना पड़ रहा है? यही वह बिंदु है, जहां “क्रीमी लेयर” की बहस और तेज हो जाती है।
मेरिट बनाम सामाजिक न्याय
समर्थकों का कहना है कि यह प्रस्ताव जाति से आगे बढ़कर जरूरत को केंद्र में लाता है। EWS आरक्षण इसी सोच का उदाहरण है। अगर संसाधन सीमित हैं, तो उनका इस्तेमाल उन लोगों पर होना चाहिए, जिनके पास वाकई कोई बैकअप नहीं है। वहीं विरोधियों की दलील है कि आरक्षण गरीबी हटाने की योजना नहीं, बल्कि सामाजिक भेदभाव का जवाब है। केवल आर्थिक आधार पर आरक्षण खत्म करना, उस भेदभाव को नजरअंदाज करना होगा जो आज भी कई रूपों में मौजूद है।
सुप्रीम कोर्ट के संकेत और बदलता नजरिया
हाल के फैसलों में सुप्रीम कोर्ट यह स्पष्ट कर चुका है कि जो आरक्षित उम्मीदवार मेरिट के आधार पर चयनित होते हैं, उन्हें ओपन कैटेगरी में गिना जाना चाहिए। यह सोच बताती है कि न्यायपालिका भी अब संतुलन की भाषा बोल रही है, न कि पूर्ण समर्थन या पूर्ण विरोध की।
आगे का रास्ता: संतुलन ही समाधान
समाधान न तो आरक्षण को अचानक खत्म करना है, न ही उसे छेड़ना मना कर देना। जरूरत है एक पारदर्शी समीक्षा प्रणाली की जहां परिवार की आय, संपत्ति और सरकारी नौकरियों की संख्या को देखा जाए। हर 10 साल में नीति की समीक्षा हो, ताकि आरक्षण एक स्थायी बैसाखी नहीं, बल्कि आगे बढ़ने का सेतु बना रहे।
यह बयान किसी वर्ग के खिलाफ नहीं, बल्कि नीति के आत्ममंथन की मांग करता है। अगर लक्ष्य एक ऐसा समाज है, जहां पहचान से ज्यादा योग्यता मायने रखे, तो आरक्षण को भी समय के साथ खुद को ढालना होगा। सामाजिक न्याय और मेरिट के बीच संतुलन ही भारत की सबसे बड़ी परीक्षा है।
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