अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प एक बार फिर अपने बयानों को लेकर वैश्विक राजनीति के केंद्र में हैं। इस बार निशाने पर है ग्रीनलैंड। बयान इतने लगातार और आक्रामक रहे कि यूरोप में बेचैनी स्वाभाविक थी। डेनमार्क और ग्रीनलैंड ने पहले आपत्ति जताई, फिर धीरे-धीरे अन्य यूरोपीय देश भी स्वर ऊँचा करने लगे। आम धारणा यह बनी कि यूरोप अब भी इतना ताकतवर है कि अमेरिका को संतुलन में रख सकेगा।लेकिन ज़मीनी हकीकत कुछ और ही कहानी कहती दिखी।
ग्रीनलैंड पर यूरोप की प्रतिक्रिया
15 जनवरी को नाटो के कुछ सदस्य देशों ने ग्रीनलैंड में सैनिक भेजने का फैसला किया। इसे ऑपरेशन आर्कटिक एंड्योरेंस नाम दिया गया। सुनने में बड़ा लगता है, लेकिन कुल मिलाकर केवल 36 सैनिक पहुंचे। किसी देश ने एक, किसी ने दो सैनिक भेजे। यह कदम प्रतीकात्मक ज़्यादा और रणनीतिक कम दिखा। इटली जैसे देशों ने इसे गंभीर सैन्य जवाब मानने से ही इनकार कर दिया।
अमेरिका का आर्थिक दबाव
17 जनवरी को ट्रम्प ने खेल पलट दिया। डेनमार्क, जर्मनी, फ्रांस, नॉर्वे और स्वीडन समेत आठ यूरोपीय देशों पर 10 प्रतिशत टैरिफ की घोषणा कर दी। साफ संदेश था, राजनीतिक असहमति की कीमत आर्थिक रूप से चुकानी होगी। साथ ही यह भी कहा गया कि अगर ग्रीनलैंड पर सहमति नहीं बनी, तो यही शुल्क आगे चलकर 25 प्रतिशत तक बढ़ सकता है। यहीं से यूरोप की एकजुटता डगमगाती दिखी।
सैनिकों की वापसी और बदला हुआ सुर
इसी दिन जर्मनी ने अपनी 15 सदस्यीय टोही टीम को ग्रीनलैंड से वापस बुला लिया। टीम महज़ 44 घंटे में लौट आई। संकेत साफ था, यूरोप टकराव नहीं, संवाद चाहता है। माना जा रहा है कि अन्य देश भी जल्द ही यही रास्ता अपनाएंगे। 19 जनवरी को डेनमार्क और ग्रीनलैंड के प्रतिनिधि नाटो महासचिव से मिलने ब्रसेल्स पहुंचे। चर्चा का विषय अब सैन्य जवाब नहीं, बल्कि टैरिफ से निपटने की रणनीति था।
क्या यूरोप की ताकत कम हो गई है?
यूरोप लंबे समय तक सैन्य और आर्थिक शक्ति का प्रतीक रहा। लेकिन हाल के घटनाक्रम यह दिखाते हैं कि आज वह ज़्यादा हद तक अमेरिका पर निर्भर है। जब अमेरिका किसी संघर्ष में उतरता है, तो यूरोपीय देश साथ देते हैं। मगर जब वही अमेरिका दबाव बनाता है, तो यूरोप की सामूहिक क्षमता सीमित नज़र आती है। ग्रीनलैंड का मुद्दा इसी बदलते संतुलन का उदाहरण बन गया है।
रूस, यूक्रेन और बड़ी तस्वीर
इस खींचतान का सबसे बड़ा असर यूक्रेन पर पड़ सकता है। अगर यूरोप अमेरिका से दूरी बनाता है, तो रूस के साथ समीकरण बदल सकते हैं। ऐसी स्थिति में लाभ किसे होगा, यह समझना मुश्किल नहीं। अंतरराष्ट्रीय राजनीति में कभी-कभी फैसले खुले मंच पर नहीं, बल्कि बंद दरवाज़ों के पीछे तय होते हैं। यही कारण है कि ट्रम्प और पुतिन की संभावित समझ को लेकर अटकलें तेज़ हैं।
ग्रीनलैंड का मसला सिर्फ एक द्वीप का नहीं, बल्कि वैश्विक शक्ति संतुलन का प्रतीक बन चुका है। यूरोप की प्रतिक्रिया ने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या वह अब भी उतना प्रभावशाली है जितना माना जाता है। आने वाले समय में यह साफ होगा कि यह घटना एक अस्थायी झटका थी या वाकई एक नए विश्व क्रम की शुरुआत।
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