Last updated: January 22nd, 2026 at 07:37 am
नई दिल्ली/नैनीताल:
सुप्रीम कोर्ट ने उत्तराखंड हाईकोर्ट के एक अहम फैसले को निरस्त करते हुए राज्य के दो न्यायिक अधिकारियों को बड़ी राहत प्रदान की है। शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया है कि केवल इस आधार पर किसी अधिकारी को आगे बढ़ने से नहीं रोका जा सकता कि उसके स्थानांतरण से राज्य में पद रिक्त हो जाएंगे।
न्यायमूर्ति बी.वी. नागरत्ना और न्यायमूर्ति उज्ज्वल भुइयां की पीठ ने उत्तराखंड न्यायिक सेवा में कार्यरत सिविल जज (जूनियर डिवीजन) अनुभूति गोयल सहित दो अधिकारियों को दिल्ली न्यायिक सेवा में शामिल होने की अनुमति दे दी है।
क्या है पूरा मामला
याचिकाकर्ताओं ने उत्तराखंड में नियुक्ति से पहले ही दिल्ली न्यायिक सेवा परीक्षा–2023 के लिए आवेदन किया था। बाद में उन्होंने दिल्ली की मुख्य परीक्षा और साक्षात्कार में सफलता प्राप्त की। इसके बाद उन्होंने उत्तराखंड हाईकोर्ट से दिल्ली में जॉइन करने की अनुमति मांगी थी।
हालांकि, उत्तराखंड हाईकोर्ट ने 19 फरवरी 2025 को उनकी याचिका यह कहते हुए खारिज कर दी थी कि उनके जाने से राज्य में जजों के पद खाली हो जाएंगे और लंबित मामलों पर प्रतिकूल असर पड़ेगा।
सुप्रीम कोर्ट की अहम टिप्पणी
सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट की दलीलों को खारिज करते हुए कहा कि किसी व्यक्ति को बेहतर करियर विकल्प चुनने से रोकना संविधान के अनुच्छेद 19(1)(जी) के तहत प्रदत्त पेशे की स्वतंत्रता का उल्लंघन है।
पीठ ने कहा कि यदि अधिकारियों को आगे बढ़ने से रोका जाता है, तो इससे उनके मन में कुंठा और असंतोष पैदा हो सकता है, जो न्यायिक प्रणाली के लिए भी उचित नहीं है।
रिक्त पदों पर क्या कहा कोर्ट ने
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि इन अधिकारियों के दिल्ली जाने से उत्पन्न रिक्तियों को नई भर्ती प्रक्रिया के माध्यम से समय रहते भरा जा सकता है। राज्य में पद खाली होने की आशंका किसी व्यक्ति के मौलिक अधिकारों से ऊपर नहीं हो सकती।
वरिष्ठता को लेकर भी राहत
कोर्ट ने निर्देश दिया कि दिल्ली न्यायिक सेवा में शामिल होने में हुई देरी के बावजूद, याचिकाकर्ताओं की वरिष्ठता उनकी मूल मेरिट सूची के अनुसार ही तय की जाएगी।इसके साथ ही उत्तराखंड हाईकोर्ट को आदेश दिया गया है कि वह याचिकाकर्ताओं की सेवा समाप्ति की औपचारिक प्रक्रिया पूरी करे, ताकि वे 13 फरवरी 2026 तक दिल्ली न्यायिक सेवा में कार्यभार ग्रहण कर सकें।
सुप्रीम कोर्ट का स्पष्ट संदेश
शीर्ष अदालत ने दो टूक कहा कि न्यायिक अधिकारियों का व्यक्तिगत और पेशेवर हित, राज्य में रिक्तियों की प्रशासनिक चिंता से कहीं अधिक महत्वपूर्ण है।
![]()
Comments are off for this post.