
उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव अभी दूर हैं, लेकिन सियासी हलचल अभी से तेज हो चुकी है। एक तरफ मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ लगातार तीसरी बार सत्ता में लौटने का दावा कर रहे हैं, तो दूसरी तरफ समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव खुलकर कह रहे हैं कि इस बार भाजपा का विजय रथ रोका जाएगा। ऐसे माहौल में हर बयान, हर बैठक और हर संभावित गठबंधन पर सियासी नजरें टिकी हैं।
AIMIM गठबंधन पर अखिलेश का सख्त संदेश
चुनाव से पहले सबसे ज्यादा चर्चा इस बात की है कि क्या समाजवादी पार्टी, असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी AIMIM के साथ कोई गठबंधन करेगी। जब इस मुद्दे पर अखिलेश यादव से सवाल किया गया, तो उनका जवाब बेहद साफ और सख्त था। उन्होंने कहा, “आप अपनाचैनल चलाओ, किसी का एजेंडा मत चलाओ। हम PDA को लेकर आगे बढ़ रहे हैं।”
इस बयान से अखिलेश ने दो बातें साफ कर दीं पहली, AIMIM के साथ किसी गठबंधन की फिलहाल कोई योजना नहीं है। दूसरी, सपा की पूरी राजनीति अब PDA यानी पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक समीकरण पर केंद्रित है।
लखनऊ बैठक और पार्टी के भीतर की चिंता
मंगलवार को लखनऊ में हुई सपा सांसदों की अहम बैठक ने पार्टी की अंदरूनी सोच को भी उजागर किया। बैठक का आधिकारिक एजेंडा भले ही पंचायत चुनाव और संगठन की मजबूती था, लेकिन चर्चा के दौरान दो नाम बार-बार सामने आए असदुद्दीन ओवैसी और चंद्रशेखर आजाद। एक सांसद ने साफ कहा कि जिस तरह ओवैसी का असर मुस्लिम बहुल इलाकों में बढ़ रहा है, वह 2027 के लिए खतरे की घंटी हो सकता है। वहीं, दूसरे सांसद ने चंद्रशेखर आजाद का जिक्र करते हुए कहा कि वे जमीनी स्तर पर सपा के स्थानीय नेताओं को प्रभावित कर रहे हैं।
बिहार और महाराष्ट्र से मिला सियासी सबक
सपा नेताओं की चिंता यूं ही नहीं है। बिहार के पिछले चुनाव नतीजे और महाराष्ट्र के निकाय चुनाव, खासकर BMC की राजनीति, यह दिखा चुकी है कि क्षेत्रीय और वैकल्पिक राजनीतिक ताकतें बड़े दलों का गणित बिगाड़ सकती हैं। ओवैसी की राजनीति जहां मुस्लिम वोटों में सीधी सेंध लगाती है, वहीं चंद्रशेखर आजाद दलित युवाओं के बीच अपनी अलग पहचान बना चुके हैं।
अखिलेश की रणनीति: अकेले मुकाबला या नया मोर्चा?
अखिलेश यादव ने बैठक में अपने सांसदों को भरोसा दिलाया कि इन चुनौतियों से निपटने की रणनीति तैयार है। लेकिन असली सवाल यही है कि आने वाले समय में क्या ओवैसी इंडिया गठबंधन का हिस्सा बनेंगे या सपा को अकेले ही इस सियासी सेंधमारी का मुकाबला करना पड़ेगा।
फिलहाल अखिलेश का फोकस साफ है PDA को मजबूत करना और भाजपा के खिलाफ सीधी लड़ाई। लेकिन यूपी की राजनीति में समीकरण कब बदल जाएं, यह कोई नहीं जानता। 2027 की लड़ाई सिर्फ सत्ता की नहीं, बल्कि प्रभाव और भरोसे की भी होगी।
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