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वृंदावन में ठाकुर बांकेबिहारी मंदिर विवाद: मुख्यमंत्री के दौरे में सेवायतों का विरोध, महिलाओं से धक्का-मुक्की पर सवाल

वृंदावन स्थित ठाकुर बांकेबिहारी मंदिर एक बार फिर सियासी और प्रशासनिक बहस के केंद्र में आ गया है। मुख्यमंत्री योगी
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वृंदावन स्थित ठाकुर बांकेबिहारी मंदिर एक बार फिर सियासी और प्रशासनिक बहस के केंद्र में आ गया है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के मंदिर दर्शन के दौरान सेवायतों द्वारा मंदिर अधिग्रहण और प्रस्तावित गलियारा योजना के विरोध ने माहौल को तनावपूर्ण बना दिया। यह विरोध सिर्फ नारेबाजी तक सीमित नहीं रहा, बल्कि पुलिस और सेवायत परिवारों, खासकर महिलाओं, के बीच हुई धक्का-मुक्की ने कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए।

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    सेवायतों का आरोप: मंदिर पर अधिकार छीने जाने की आशंका

    सेवायतों का कहना है कि मंदिर अधिग्रहण और गलियारा योजना से सदियों पुरानी परंपराओं और सेवायत व्यवस्था पर सीधा असर पड़ेगा। उनका मानना है कि यह सिर्फ विकास का मुद्दा नहीं, बल्कि आस्था, अधिकार और पहचान से जुड़ा सवाल है। मुख्यमंत्री के सामने अपनी बात रखने पहुंचे सेवायतों को जब रोका गया, तो आक्रोश और बढ़ गया।

    पुलिस कार्रवाई और महिलाओं के साथ अभद्रता का आरोप

    विरोध के दौरान हालात तब बिगड़े जब पुलिस ने प्रदर्शनकारी सेवायतों को रोकने के लिए बल प्रयोग किया। आरोप है कि इसमें सेवायत परिवार की महिलाओं के साथ भी धक्का-मुक्की की गई। एक सेवायत जानी गोस्वामी के कपड़े फटने की घटना ने मामले को और संवेदनशील बना दिया। सेवायतों का कहना है कि महिलाओं को न सिर्फ मंदिर में प्रवेश से रोका गया, बल्कि उन्हें कोठरी में बंद तक कर दिया गया।

    गेट नंबर चार पर रोकी गई महिलाएं

    मुख्यमंत्री के सामने विरोध दर्ज कराने पहुंचीं महिलाओं को गेट नंबर चार पर ही रोक दिया गया। जब उन्होंने आगे बढ़ने की कोशिश की, तो पुलिस और सुरक्षा कर्मियों द्वारा अभद्रता और धक्का-मुक्की किए जाने का आरोप लगा। इसके बाद महिलाएं परिक्रमा मार्ग से मंदिर चबूतरे तक पहुंचना चाहती थीं, लेकिन परिक्रमा का गेट भी बंद कर दिया गया।

    परिक्रमा मार्ग में गूंजे विरोधी नारे

    रास्ते बंद होने के बाद महिलाओं ने वहीं परिक्रमा मार्ग में मंदिर अधिग्रहण और गलियारा योजना के खिलाफ नारेबाजी शुरू कर दी। “मंदिर हमारा है”, “अधिग्रहण नहीं चलेगा” जैसे नारों से माहौल गूंज उठा। यह दृश्य दिखाता है कि यह विवाद केवल प्रशासनिक नहीं, बल्कि भावनात्मक भी है।

    आस्था, प्रशासन और सवाल

    इस पूरे घटनाक्रम ने प्रशासन की भूमिका पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं। आस्था के केंद्र माने जाने वाले स्थान पर महिलाओं के साथ कथित अभद्रता और बल प्रयोग को लेकर नाराज़गी साफ नजर आई। दूसरी ओर, सरकार और प्रशासन की ओर से इसे सुरक्षा व्यवस्था का हिस्सा बताया जा सकता है, लेकिन जिस तरह विरोध दबाने की कोशिश हुई, उसने हालात को और बिगाड़ दिया।

    वृंदावन का यह विवाद अब सिर्फ मंदिर अधिग्रहण या गलियारे तक सीमित नहीं रहा। यह सवाल बन गया है कि विकास और आस्था के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए, और क्या विरोध की आवाज को इस तरह दबाया जाना सही है।

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