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चाइनीज मांझा: प्रशासन के दावों के बीच शहर की सड़कों पर मौत की डोर

शहर में चाइनीज मांझे पर प्रतिबंध के दावे हर साल दोहराए जाते हैं, लेकिन हकीकत हर बार उससे कहीं ज्यादा
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शहर में चाइनीज मांझे पर प्रतिबंध के दावे हर साल दोहराए जाते हैं, लेकिन हकीकत हर बार उससे कहीं ज्यादा डरावनी साबित होती है। कागजों में सख्ती है, बयानों में अभियान है, मगर जमीन पर हालात वही हैं खुलेआम बिकता चाइनीज मांझा और सड़कों पर लहूलुहान होते लोग। वसंत पंचमी जैसे पर्व, जो खुशियों और पतंगों का प्रतीक हैं, अब लोगों के लिए डर और असुरक्षा का कारण बनते जा रहे हैं।

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    हेलमेट के बावजूद नहीं बची जान

    शनिवार को हुई दो घटनाएं इस खतरे की गंभीरता को साफ दिखाती हैं। हापुड़ रोड पर बाइक से ड्यूटी पर जा रहे दारोगा ऋषभ गुप्ता अचानक हवा में लहरा रहे चाइनीज मांझे की चपेट में आ गए। हेलमेट पहने होने के बावजूद उनकी ठोड़ी कट गई और उन्हें 18 टांके लगाने पड़े। यह सिर्फ एक हादसा नहीं, बल्कि सिस्टम की नाकामी का जीता-जागता उदाहरण है।

    आम नागरिक भी असुरक्षित

    दूसरी घटना कचहरी नाला रोड की है, जहां सॉफ्टवेयर इंजीनियर सूर्यांश अपनी पत्नी को डॉक्टर के पास ले जा रहे थे। हेलमेट का शीशा थोड़ा उठा हुआ था और यही एक पल की चूक उनके लिए गंभीर चोट का कारण बन गई। चाइनीज मांझा इतनी तेजी से उनके हेलमेट में उलझा कि नाक और होंठ तक गहरे घाव हो गए। उनका कहना है कि अगर हेलमेट न होता, तो परिणाम कहीं ज्यादा भयावह हो सकते थे।

    अभियान सिर्फ नाम के

    पुलिस-प्रशासन द्वारा चलाए गए अभियान भी सवालों के घेरे में हैं। वसंत पंचमी से पहले कार्रवाई की बात जरूर हुई, लेकिन लिसाड़ी गेट थाना क्षेत्र को छोड़ दें तो किसी बड़े स्तर पर बरामदगी सामने नहीं आई। दुकानों में यह मांझा आसानी से उपलब्ध है और पतंग कटने के बाद हवा में लहराता मांझा राहगीरों के लिए जानलेवा जाल बन जाता है।

    बयान और हकीकत का फासला

    एसपी सिटी की ओर से सख्त कार्रवाई की बात कही जा रही है और कुछ गिरफ्तारियां भी हुई हैं, लेकिन जब तक बिक्री और इस्तेमाल दोनों पर प्रभावी रोक नहीं लगेगी, तब तक ऐसे हादसे थमने वाले नहीं हैं। यह सिर्फ कानून व्यवस्था का मुद्दा नहीं, बल्कि आम लोगों की जान से जुड़ा सवाल है।

    अब चुप रहने की नहीं जरूरत

    चाइनीज मांझा सिर्फ एक गैरकानूनी सामान नहीं, बल्कि एक चलती-फिरती धारदार हथियार है। प्रशासन के साथ-साथ समाज को भी यह समझना होगा कि पतंग उड़ाने की खुशी किसी की जिंदगी से बड़ी नहीं हो सकती। जब तक इस पर सामूहिक जिम्मेदारी नहीं ली जाएगी, तब तक हर सड़क, हर मोड़ पर मौत की डोर लहराती रहेगी।

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