Last updated: January 26th, 2026 at 08:29 am

प्रयागराज में माघ मेले के दौरान शुरू हुआ एक धार्मिक विवाद अब उत्तर प्रदेश की राजनीति और प्रशासन के लिए बड़ी चुनौती बन चुका है। शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद पिछले कई दिनों से धरने पर बैठे हैं और उनका यह विरोध केवल एक संत का आक्रोश नहीं, बल्कि व्यवस्था पर उठता हुआ बड़ा सवाल बन गया है। मौनी अमावस्या के स्नान को लेकर जो कुछ हुआ, उसने धार्मिक भावनाओं, प्रशासनिक फैसलों और राजनीतिक प्रतिक्रियाओं को एक ही मंच पर ला खड़ा किया है।
मौनी अमावस्या और टकराव की शुरुआत
पूरा विवाद उस वक्त शुरू हुआ जब मौनी अमावस्या के दिन शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद पालकी में सवार होकर स्नान के लिए जा रहे थे। प्रशासन ने सुरक्षा और प्रबंधन का हवाला देते हुए उन्हें आगे बढ़ने से रोक दिया। यहीं से हालात बिगड़ने लगे। समर्थकों और पुलिस के बीच धक्का मुक्की हुई और संत समाज में गहरी नाराजगी फैल गई। एक संत को रोकना केवल एक व्यक्ति को रोकना नहीं माना गया, बल्कि इसे परंपरा और सम्मान से जोड़कर देखा गया।
धरने पर बैठे शंकराचार्य
घटना के बाद शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने धरने पर बैठने का फैसला किया। उनका कहना है कि यह केवल उनके सम्मान का मामला नहीं, बल्कि सनातन परंपराओं के साथ हो रहे व्यवहार का प्रतीक है। धरना जैसे जैसे लंबा खिंचता गया, वैसे वैसे यह मुद्दा प्रयागराज से निकलकर पूरे प्रदेश में चर्चा का विषय बन गया। संत समाज के कई लोग खुलकर उनके समर्थन में सामने आए।
प्रशासनिक नोटिस और विवाद का विस्तार
विवाद उस समय और बढ़ गया जब प्रशासन ने शंकराचार्य को नोटिस थमा दिया। नोटिस में सवाल उठाया गया कि शंकराचार्य पद से जुड़ा मामला सुप्रीम कोर्ट में लंबित है, ऐसे में वे खुद को शंकराचार्य कैसे लिख सकते हैं। संत समाज ने इसे अपमानजनक कदम बताया। इस एक नोटिस ने धार्मिक विवाद को कानूनी और राजनीतिक बहस में बदल दिया।
अखिलेश यादव का बयान और सियासी रंग
गणतंत्र दिवस के मौके पर समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव ने इस पूरे मामले पर खुलकर प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कहा कि सरकार ने शंकराचार्य जी के साथ जो किया, वह सबने देखा है। अखिलेश यादव ने आरोप लगाया कि सरकार ने पौराणिक और धार्मिक चीजों पर बुलडोजर चलवा दिया है। साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि इस बुलडोजर का जवाब जनता आने वाले समय में वोट से देगी। इस बयान के बाद यह साफ हो गया कि मामला अब केवल धार्मिक नहीं रहा।
सवाल जो अब भी बाकी हैं
यह विवाद कई सवाल छोड़ जाता है। क्या प्रशासन और परंपराओं के बीच संतुलन नहीं बन पाया। क्या एक संत के साथ हुए व्यवहार को टाला जा सकता था। और सबसे बड़ा सवाल यह कि क्या धार्मिक आयोजनों में संवेदनशीलता की कमी राजनीति को और तेज कर रही है। शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद का धरना आज केवल एक विरोध नहीं, बल्कि उत्तर प्रदेश में धर्म, सत्ता और सम्मान के बीच खिंची एक लंबी रेखा बन चुका है।
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