Last updated: January 31st, 2026 at 09:38 am
देहरादून।
उत्तराखंड में जबरन धर्म परिवर्तन पर रोक के लिए लागू किए गए उत्तराखंड फ्रीडम ऑफ रिलीजन एक्ट को करीब सात साल हो चुके हैं। इस दौरान सरकार ने कानून को कई बार सख्त बनाया, धाराएं बढ़ाईं और गिरफ्तारियां भी हुईं, लेकिन आंकड़े बताते हैं कि अब तक इस कानून के तहत एक भी मामले में सजा नहीं हो सकी है। अदालती रिकॉर्ड और आरटीआई से सामने आए तथ्यों के अनुसार, राज्य के 13 जिलों में अब तक इस कानून के तहत कुल 62 मुकदमे दर्ज किए गए। इनमें से केवल 5 मामले ही पूरे ट्रायल तक पहुंच पाए, और इन सभी में अदालतों ने आरोपियों को बरी कर दिया। यानी दोष सिद्ध होने की दर शून्य रही।
अदालत तक पहुंचने से पहले ही ढह गए ज्यादातर केस
कई मामलों में शिकायतकर्ता अपने ही आरोपों से मुकर गए, कहीं गवाहों ने बयान बदल लिए, तो कई जगह पुलिस जांच की खामियां अदालतों के सामने उजागर हुईं। इसका सीधा असर यह हुआ कि कानून की सख्ती कोर्ट में टिक नहीं पाई। सितंबर 2025 तक उपलब्ध रिकॉर्ड के अनुसार, 51 मामलों की स्थिति स्पष्ट है। इनमें से अधिकतर केस या तो खारिज हो चुके हैं या आरोपी जमानत पर हैं। केवल पांच मामलों में सुनवाई पूरी हुई और सभी में आरोप साबित नहीं हो सके।
ट्रायल वाले मामलों में क्यों नाकाम रही पुलिस
जिन मामलों में ट्रायल पूरा हुआ, वहां अदालतों ने साफ कहा कि लालच, दबाव या जबरन धर्म परिवर्तन का ठोस सबूत पेश नहीं किया जा सका।
कुछ मामलों में शिकायत तीसरे पक्ष ने की, जो कानून के प्रावधानों के खिलाफ थी। कहीं डिजिटल सबूत सत्यापित नहीं हो सके, तो कहीं पीड़ितों ने अदालत में यह स्वीकार किया कि उन्होंने अपनी मर्जी से निर्णय लिया था।
बयान बदले, रिश्ते सहमति से निकले
कई मामलों में अदालतों ने माना कि युवक-युवती के रिश्ते आपसी सहमति से थे। कुछ मामलों में अपहरण, दुष्कर्म और धर्मांतरण की धाराएं एक साथ जोड़ी गईं, लेकिन सुनवाई के दौरान आरोप टिक नहीं पाए। कुछ केस ऐसे भी रहे, जहां कथित पीड़ितों ने पुलिस के सामने दिए गए शुरुआती बयान से अदालत में पूरी तरह इनकार कर दिया।
‘लव जिहाद’ के आरोप भी कोर्ट में कमजोर पड़े
कुछ मामलों में मुस्लिम युवकों पर पहचान छिपाकर प्रेमजाल में फंसाने के आरोप लगे, लेकिन इनमें से कई केसों में या तो शिकायतकर्ताओं ने आरोप वापस ले लिए या जांच में गंभीर विरोधाभास पाए गए। अदालतों ने ऐसे मामलों में भी राहत दी।
शादी और सुरक्षा मांगने पर उलटी कार्रवाई
कानून के तहत अंतरधार्मिक विवाह से पहले जिला प्रशासन को सूचना देना अनिवार्य है। लेकिन कम से कम चार मामलों में ऐसे जोड़े सामने आए जिन्होंने परिवार से खतरे की आशंका जताते हुए सुरक्षा मांगी, और बाद में उन्हीं पर कानून के तहत केस दर्ज हो गया। इनमें से अधिकांश मामलों में हाईकोर्ट ने हस्तक्षेप कर राहत दी।
कानून सख्त होता गया, नतीजे कमजोर रहे
2018 में लागू हुए इस कानून में 2022 में सजा की अवधि बढ़ाई गई। 2025 में और सख्त संशोधन का प्रस्ताव लाया गया, जिसमें 10 साल से लेकर आजीवन कारावास तक की सजा का प्रावधान रखा गया। हालांकि यह संशोधन अभी लागू नहीं हो सका है। आंकड़े बताते हैं कि कानून में सख्ती बढ़ने के बावजूद अदालतों में मामले टिक नहीं पा रहे। इससे यह सवाल खड़ा हो रहा है कि क्या जांच की प्रक्रिया कमजोर है, या फिर कानून के इस्तेमाल में संतुलन की कमी है।
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