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उत्तराखंड बना नई नीतियों की प्रयोगशाला: यूसीसी समेत चार प्रमुख कानूनों पर राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा तेज

देहरादून। आध्यात्मिक और सांस्कृतिक पहचान के लिए प्रसिद्ध उत्तराखंड अब नीतिगत प्रयोगों के कारण राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में आ
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देहरादून। आध्यात्मिक और सांस्कृतिक पहचान के लिए प्रसिद्ध उत्तराखंड अब नीतिगत प्रयोगों के कारण राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में आ गया है। पिछले कुछ वर्षों में राज्य सरकार द्वारा लागू किए गए कई अहम कानूनों ने देशभर का ध्यान आकर्षित किया है। समान नागरिक संहिता (UCC), अल्पसंख्यक शिक्षा कानून, सख्त धर्मांतरण कानून और भूमि व धार्मिक अतिक्रमण पर कार्रवाई जैसे फैसलों ने उत्तराखंड को एक तरह से ‘पॉलिटिकल लैब’ के रूप में स्थापित कर दिया है।

Table of Contents

    यूसीसी पर राष्ट्रीय विमर्श

    उत्तराखंड देश का पहला राज्य है जिसने समान नागरिक संहिता को लागू करने की दिशा में ठोस कदम उठाए और इसके क्रियान्वयन की प्रक्रिया को आगे बढ़ाया। राज्य सरकार का दावा है कि इस कानून का उद्देश्य सभी नागरिकों को समान कानूनी अधिकार देना है। हाल ही में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के एक कार्यक्रम में सरसंघचालक मोहन भागवत ने उत्तराखंड में लागू यूसीसी को राष्ट्रीय एकता की दिशा में सकारात्मक पहल बताया। उन्होंने इसे व्यापक जनसंवाद और विभिन्न समुदायों की भागीदारी के साथ आगे बढ़ाने की प्रक्रिया का उदाहरण भी बताया।

    अल्पसंख्यक शिक्षा कानून में बदलाव

    राज्य सरकार ने उत्तराखंड अल्पसंख्यक शिक्षा अधिनियम लागू कर शिक्षा व्यवस्था में नई संरचना प्रस्तुत की है। इस कानून के तहत मुस्लिम, सिख, जैन, बौद्ध, ईसाई और पारसी समुदायों के शैक्षणिक संस्थान शामिल किए गए हैं। साथ ही 1 जुलाई 2026 से राज्य में मदरसा बोर्ड को समाप्त करने का प्रावधान किया गया है। कानून के प्रभावी क्रियान्वयन के लिए 11 सदस्यीय अल्पसंख्यक शिक्षा प्राधिकरण का गठन किया गया है।

    धर्मांतरण और ‘लव जिहाद’ कानून सख्त

    राज्य सरकार ने धर्मांतरण के मामलों में सजा के प्रावधानों को और कठोर बनाया है। इसके साथ ही तथाकथित ‘लव जिहाद’ और ‘लैंड जिहाद’ से जुड़े मामलों में भी कानूनी प्रावधानों को मजबूत किया गया है। सरकार का कहना है कि इन कदमों का उद्देश्य कानून-व्यवस्था बनाए रखना और अवैध गतिविधियों पर अंकुश लगाना है।

    सरकारी भूमि पर अतिक्रमण के खिलाफ कार्रवाई

    धार्मिक प्रतीकों के माध्यम से सरकारी भूमि पर कब्जे के मामलों में भी सख्त रुख अपनाया गया है। हल्द्वानी के बनभूलपुरा प्रकरण के बाद प्रशासन ने कड़ी कार्रवाई कर स्पष्ट संदेश देने का प्रयास किया। सरकार का दावा है कि अवैध अतिक्रमण पर प्रभावी नियंत्रण स्थापित किया गया है।

    चुनावी कसौटी पर होंगे फैसले

    अगले वर्ष होने वाले विधानसभा चुनाव से पहले इन कानूनों और नीतियों को राजनीतिक दृष्टि से भी अहम माना जा रहा है। भाजपा इन फैसलों को अपने चुनावी वादों के क्रियान्वयन के रूप में पेश कर रही है। अब यह देखना दिलचस्प होगा कि राज्य की जनता इन पहलों को किस नजरिए से देखती है। उत्तराखंड में लागू इन नीतिगत प्रयोगों पर अन्य राज्यों और राष्ट्रीय स्तर पर भी चर्चा तेज हो गई है। आने वाले समय में यह मॉडल व्यापक स्तर पर किस प्रकार अपनाया जाता है, इस पर सबकी नजरें टिकी हैं।

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