Last updated: February 19th, 2026 at 07:26 am

New Delhi: देश के लाखों प्रशिक्षित और प्रमाणित ग्रामीण चिकित्सकों के अधिकारों को लेकर अब कानूनी जंग राष्ट्रीय स्तर पर पहुंच गई है, क्योंकि आर्श हेल्थ इंडिया फाउंडेशन ने घोषणा की है कि वह शीघ्र ही Supreme Court of India में जनहित याचिका दायर करेगी, जिसमें राज्य सरकारों द्वारा प्रशिक्षण और प्रमाणपत्र दिए जाने के बावजूद ग्रामीण चिकित्सकों को कानूनी मान्यता और नियमित रोजगार न देने के मुद्दे को प्रमुखता से उठाया जाएगा। फाउंडेशन का कहना है कि जब सरकारें स्वयं ग्रामीण युवाओं को स्वास्थ्य सेवाओं के लिए प्रशिक्षित कर प्रमाणित करती हैं, तो उसके बाद उन्हें स्वास्थ्य तंत्र से बाहर रखना न केवल अन्यायपूर्ण और भेदभावपूर्ण है, बल्कि यह संविधान में निहित समान अवसर और जीवन के अधिकार की भावना के भी विपरीत है। संस्था के अनुसार, देश के ग्रामीण और दूरदराज क्षेत्रों में डॉक्टरों और स्वास्थ्य संसाधनों की भारी कमी है, जहां प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों में पर्याप्त चिकित्सक उपलब्ध नहीं हैं, ऐसे में प्रशिक्षित ग्रामीण चिकित्सकों की सेवाओं को नजरअंदाज करना ग्रामीण जनता के स्वास्थ्य अधिकारों के साथ भी अन्याय है। फाउंडेशन ने स्पष्ट किया है कि उनकी मांग केवल रोजगार तक सीमित नहीं है, बल्कि वे प्रशिक्षित ग्रामीण चिकित्सकों को कानूनी मान्यता, सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं में समायोजन, प्राथमिक स्वास्थ्य प्रणाली में औपचारिक रूप से शामिल करने तथा केंद्र और राज्य स्तर पर स्पष्ट नीति और सुरक्षा ढांचा तैयार करने की मांग भी करेंगे। संस्था के चेयरमैन डॉ. आलोक कुमार तिवारी के नेतृत्व में एक पांच सदस्यीय प्रतिनिधिमंडल इस विषय को लेकर सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल करने की तैयारी में है और उनका कहना है कि यह कदम ग्रामीण भारत की स्वास्थ्य व्यवस्था को मजबूत करने और सामाजिक न्याय सुनिश्चित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण प्रयास होगा। फाउंडेशन ने यह भी संकेत दिया है कि यदि न्यायिक हस्तक्षेप के बावजूद ग्रामीण चिकित्सकों को उनका अधिकार नहीं मिलता है, तो आंदोलन को देशव्यापी स्तर पर लोकतांत्रिक और संवैधानिक दायरे में आगे बढ़ाया जाएगा, ताकि उन लाखों युवाओं को न्याय मिल सके जिन्होंने सरकार के निर्देश पर प्रशिक्षण प्राप्त किया, प्रमाणपत्र हासिल किया और अब वर्षों से मान्यता और रोजगार की प्रतीक्षा कर रहे हैं।
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