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बंगाल का सियासी हिसाब: 15 साल की हुकूमत, कामयाबी और आगे की कठिन राह

पश्चिम बंगाल में मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के नेतृत्व में गुजरे डेढ़ दशक को अब सिर्फ शासनकाल नहीं, बल्कि जनता के
Mamata Banerjee (3)

पश्चिम बंगाल में मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के नेतृत्व में गुजरे डेढ़ दशक को अब सिर्फ शासनकाल नहीं, बल्कि जनता के सामने पेश एक विस्तृत रिपोर्ट कार्ड के तौर पर देखा जा रहा है। विकास के दावों, जनकल्याण योजनाओं और बदले हुए इंफ्रास्ट्रक्चर के बीच यह सवाल अहम बन गया है कि क्या ये उपलब्धियां उन्हें दोबारा सत्ता तक पहुंचाने में मदद करेंगी या नहीं।

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    जहां एक ओर सरकार अपने कामकाज को उपलब्धियों के रूप में पेश कर रही है, वहीं दूसरी ओर निवेश की रफ्तार, भर्ती प्रक्रियाओं पर उठते सवाल और स्वास्थ्य सेवाओं पर बढ़ता दबाव भविष्य की चुनौतियों के तौर पर सामने हैं। आगामी चुनावों के मद्देनजर यह 15 साल का सफर सिर्फ राजनीतिक चर्चा नहीं, बल्कि मतदाताओं के फैसले की बुनियाद बन चुका है। हर दावा और हर हकीकत अब जनता की कसौटी पर है।

    छोटे उद्योगों में तेजी, बड़े निवेश की कमी बरकरार

    औद्योगिक क्षेत्र में सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्योगों (एमएसएमई) ने तेजी से विस्तार किया है। इनकी संख्या करीब 25 लाख से बढ़कर 88 लाख से अधिक हो चुकी है, जिसमें गैर-पंजीकृत इकाइयां भी शामिल हैं। रोजगार सृजन में इस क्षेत्र की अहम भूमिका रही है।

    इसके बावजूद बड़े उद्योगों को आकर्षित करने में राज्य उम्मीद के मुताबिक प्रदर्शन नहीं कर पाया है। हालांकि, सकल राज्य घरेलू उत्पाद (GSDP) 2011 के करीब 4.70 लाख करोड़ रुपये से बढ़कर 2024-25 में लगभग 18 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच गया है।

    शिक्षा में पहुंच बढ़ी, ड्रॉपआउट घटा

    शिक्षा के क्षेत्र में सरकारी योजनाओं का असर साफ नजर आता है। साक्षरता दर 77 प्रतिशत से बढ़कर करीब 80 प्रतिशत तक पहुंच गई है। प्राथमिक स्तर पर स्कूल छोड़ने वाले छात्रों की संख्या में भी गिरावट आई है, जो अब 5 प्रतिशत से कम हो गई है। राज्य में विश्वविद्यालयों की संख्या 33 से बढ़कर 57 हो गई है। छात्राओं के लिए चलाई गई योजनाओं ने शिक्षा में उनकी भागीदारी को बढ़ावा दिया है।

    स्वास्थ्य सेवाओं का दायरा बढ़ा, लेकिन दबाव भी

    स्वास्थ्य क्षेत्र में सरकारी प्रयासों से अस्पतालों और सुविधाओं में विस्तार हुआ है। सरकारी अस्पतालों की संख्या 1,270 से बढ़कर 1,500 के पार पहुंच गई है, जबकि बेड की संख्या 71 हजार से बढ़कर 97 हजार से अधिक हो गई है। ‘स्वास्थ्य साथी’ योजना के जरिए 8.5 करोड़ से ज्यादा लोगों को स्वास्थ्य बीमा का लाभ मिल रहा है, जिससे मातृ और शिशु मृत्यु दर में कमी का दावा किया जाता है। हालांकि, डॉक्टरों की कमी, अस्पतालों में भीड़ और ग्रामीण इलाकों में स्वास्थ्य सेवाओं की गुणवत्ता अब भी चिंता का विषय बनी हुई है।

    इंफ्रास्ट्रक्चर में सुधार, गांवों में अभी भी कमी

    पिछले 15 वर्षों में बुनियादी ढांचे में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। सड़कों का नेटवर्क लगभग 3 लाख किमी से बढ़कर 3.30 लाख किमी से अधिक हो गया है। बिजली उत्पादन क्षमता भी 8,500 मेगावाट से बढ़कर करीब 11,000 मेगावाट तक पहुंच गई है। इस दौरान इंफ्रास्ट्रक्चर पर खर्च में करीब 11 गुना इजाफा हुआ है। फिर भी, ग्रामीण क्षेत्रों में बुनियादी सुविधाओं की कमी एक बड़ी चुनौती के रूप में बनी हुई है।

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