Human Live Media

HomeBlogएआर रहमान के बयान से उठा सियासी सुर, क्या कला पर भी पड़ रहा है सत्ता का साया?

एआर रहमान के बयान से उठा सियासी सुर, क्या कला पर भी पड़ रहा है सत्ता का साया?

ऑस्कर विजेता और दुनिया भर में भारतीय संगीत की पहचान बन चुके एआर रहमान के एक हालिया इंटरव्यू ने अचानक
IMG_7745

ऑस्कर विजेता और दुनिया भर में भारतीय संगीत की पहचान बन चुके एआर रहमान के एक हालिया इंटरव्यू ने अचानक सियासी माहौल को गर्म कर दिया है। रहमान ने बातचीत के दौरान यह कहा कि पिछले आठ वर्षों में उन्हें बॉलीवुड में पहले की तुलना में कम काम मिला है। साथ ही उन्होंने यह भी जोड़ा कि सत्ता में आए बदलाव का रचनात्मक माहौल पर सकारात्मक असर नहीं दिखता। यह बयान सामने आते ही फिल्म इंडस्ट्री से लेकर राजनीतिक गलियारों तक बहस शुरू हो गई।

Table of Contents

    रहमान का सवाल: संगीत और माहौल

    एआर रहमान का नाम केवल एक संगीतकार का नहीं, बल्कि एक ऐसे कलाकार का है जिसने भारतीय सिनेमा को वैश्विक पहचान दिलाई। उनके शब्दों में छिपी चिंता यह थी कि रचनात्मक आज़ादी और खुला माहौल किसी भी कला के लिए ज़रूरी होता है। उन्होंने साफ कहा कि संगीत को धर्म या किसी भी तरह के भेदभाव के चश्मे से नहीं देखा जाना चाहिए। यह बात कई लोगों को छू गई, तो कई इसे राजनीति से जोड़कर देखने लगे।

    अखिलेश यादव का समर्थन

    समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव ने खुलकर एआर रहमान के पक्ष में बयान दिया। उन्होंने खुद को रहमान का पुराना प्रशंसक बताते हुए कहा कि एक समय ऐसा था जब उनके गाने रिलीज से पहले ही म्यूजिक चार्ट्स पर छा जाते थे। अखिलेश ने कहा कि कला, संगीत और संस्कृति किसी एक धर्म या विचारधारा की बपौती नहीं होती और इन्हें संकीर्ण नजरिए से नहीं देखा जाना चाहिए।

    सत्तापक्ष की प्रतिक्रिया

    दूसरी ओर, बिहार सरकार के मंत्री दिलीप जयसवाल ने रहमान के बयान को खारिज किया। उन्होंने कहा कि देश में हिंदू-मुस्लिम जैसा कोई मुद्दा नहीं है और कुछ लोग बेवजह इस तरह की बातें सोचते रहते हैं। उनके मुताबिक सरकार ‘सबका साथ, सबका विकास’ की नीति पर काम कर रही है और किसी के साथ भेदभाव नहीं हो रहा।

    कांग्रेस की चिंता

    कांग्रेस सांसद इमरान मसूद ने इस पूरे मामले को गंभीर बताया। उनका कहना था कि अगर एक ऑस्कर विजेता कलाकार यह महसूस कर रहा है कि उसे काम नहीं मिल रहा, तो यह सिर्फ फिल्म इंडस्ट्री का नहीं बल्कि पूरे समाज का सवाल बन जाता है। उन्होंने कहा कि अगर धर्म के आधार पर किसी कलाकार को मौके नहीं मिल रहे, तो यह लोकतंत्र और अभिव्यक्ति की आज़ादी के लिए खतरे की घंटी है।

    कला बनाम राजनीति

    यह पूरा विवाद एक बार फिर यह सवाल खड़ा करता है कि क्या कला को राजनीति से अलग रखा जा सकता है। एआर रहमान का बयान किसी पर सीधा आरोप नहीं था, बल्कि एक कलाकार की अनुभूति थी। लेकिन राजनीति में हर शब्द का मतलब निकाल लिया जाता है। शायद असली ज़रूरत इस बात की है कि संगीत, सिनेमा और कला को उनकी स्वतंत्रता के साथ जीने दिया जाए, ताकि रचनात्मकता सांस ले सके।

    Loading

    Comments are off for this post.