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बंगाल चुनाव में आरक्षित सीटों की निर्णायक भूमिका, एससी-एसटी वोट बैंक पर टिकी सियासी बाज़ी

पश्चिम बंगाल की सियासत में इस बार आरक्षित सीटें चुनावी तस्वीर तय करने में अहम भूमिका निभाने वाली हैं। राज्य
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पश्चिम बंगाल की सियासत में इस बार आरक्षित सीटें चुनावी तस्वीर तय करने में अहम भूमिका निभाने वाली हैं। राज्य की कुल 294 विधानसभा सीटों में से 84 सीटें अनुसूचित जाति (एससी) और अनुसूचित जनजाति (एसटी) के लिए आरक्षित हैं, जिन पर सभी प्रमुख दलों की नजर टिकी हुई है।

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    इन सीटों को चुनाव का ‘गेम चेंजर’ माना जा रहा है, क्योंकि यहां का जनादेश सत्ता की दिशा तय कर सकता है। खासकर जंगलमहल और उत्तर बंगाल के इलाके राजनीतिक रूप से बेहद संवेदनशील बने हुए हैं।

    प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हाल ही में पुरुलिया, बांकुड़ा, पश्चिम मेदिनीपुर और झाड़ग्राम में कई रैलियां कर इन क्षेत्रों में माहौल को गर्म कर दिया है। वहीं दूसरी ओर मुख्यमंत्री ममता बनर्जी भी लगातार जनसभाएं कर अपनी पकड़ मजबूत करने में जुटी हैं।

    राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि कभी वामपंथ का गढ़ रही ये सीटें अब पूरी तरह से बदल चुकी हैं। 2011 के बाद तृणमूल कांग्रेस ने यहां मजबूत पकड़ बनाई, लेकिन 2021 के चुनाव में भाजपा ने इन क्षेत्रों में बड़ी सेंध लगाकर मुकाबले को कड़ा बना दिया।

    आरक्षित सीटों पर इस बार मुकाबला सीधे तौर पर दो बड़े चेहरों के बीच माना जा रहा है—एक तरफ प्रधानमंत्री मोदी की लोकप्रियता, तो दूसरी तरफ ममता बनर्जी की योजनाएं और क्षेत्रीय जुड़ाव।

    तृणमूल कांग्रेस जहां अपनी सामाजिक योजनाओं और स्थानीय मुद्दों के सहारे मतदाताओं को साधने की कोशिश कर रही है, वहीं भाजपा नागरिकता संशोधन कानून (CAA) और पहचान की राजनीति के जरिए अपनी पकड़ मजबूत करना चाहती है।

    इन सीटों पर चुनावी समीकरण को प्रभावित करने वाले कई अहम मुद्दे भी हैं। इनमें आदिवासी विस्थापन, जातीय पहचान से जुड़े विवाद, और आर्थिक असमानता प्रमुख हैं। चाय बागानों और ग्रामीण इलाकों में रहने वाले दलित-आदिवासी समुदाय आज भी विकास की मुख्यधारा से काफी हद तक दूर हैं, जो चुनाव में बड़ा मुद्दा बन सकता है।

    दिलचस्प बात यह है कि जहां भाजपा और तृणमूल कांग्रेस पूरी ताकत झोंक रही हैं, वहीं कांग्रेस और वामपंथी दल इस मुकाबले में कमजोर नजर आ रहे हैं।

    अब सबकी नजर इन 84 सीटों पर टिकी है, क्योंकि यही तय करेंगी कि बंगाल की सत्ता किसके हाथ में जाएगी। आने वाले दिनों में यह साफ हो जाएगा कि क्या इन आरक्षित सीटों का समीकरण फिर बदलेगा या मौजूदा रुझान बरकरार रहेगा।

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