Last updated: January 16th, 2026 at 05:18 pm

सरकारी डॉक्टरों की प्राइवेट प्रैक्टिस पर बैन: बिहार सरकार का बड़ा फैसला
बिहार सरकार ने राज्य की स्वास्थ्य व्यवस्था को मजबूत बनाने के लिए एक अहम कदम उठाया है। सरकार ने फैसला लिया है कि अब सरकारी अस्पतालों में काम करने वाले डॉक्टर निजी प्रैक्टिस नहीं कर सकेंगे। यानी जो डॉक्टर सरकार से वेतन लेते हैं, वे अब बाहर अलग से क्लिनिक या नर्सिंग होम में इलाज नहीं कर पाएंगे। इस फैसले का मुख्य उद्देश्य यह है कि डॉक्टर अपना पूरा समय और ध्यान सरकारी अस्पतालों में मरीजों की सेवा में लगाएं।
अब तक देखा गया था कि कई सरकारी डॉक्टर सुबह सरकारी अस्पताल में थोड़ी देर काम करते थे और फिर अपनी निजी प्रैक्टिस में चले जाते थे। इससे सरकारी अस्पतालों में मरीजों को समय पर डॉक्टर नहीं मिल पाते थे। कई बार दूर-दराज से आए मरीजों को घंटों इंतजार करना पड़ता था। सरकार को लगातार शिकायतें मिल रही थीं कि सरकारी अस्पतालों में डॉक्टर उपलब्ध नहीं रहते और इलाज में लापरवाही होती है। इसी वजह से सरकार ने यह सख्त फैसला लिया है।
सरकार का कहना है कि जब डॉक्टर सरकारी सेवा में हैं और उन्हें तनख्वाह मिल रही है, तो उनका पहला और पूरा फर्ज सरकारी अस्पताल में मरीजों की देखभाल करना होना चाहिए। इस फैसले से उम्मीद है कि अस्पतालों में डॉक्टरों की मौजूदगी बढ़ेगी, ओपीडी और वार्ड में समय पर इलाज होगा और मरीजों को बेहतर सुविधा मिलेगी।
इस नियम के लागू होने के बाद डॉक्टरों को तय समय तक अस्पताल में रहना होगा। इमरजेंसी, ओपीडी, ऑपरेशन थिएटर और वार्ड में उनकी जिम्मेदारी और बढ़ेगी। इससे खासकर गरीब और ग्रामीण इलाकों के मरीजों को फायदा होगा, क्योंकि वे निजी अस्पतालों में महंगा इलाज कराने में सक्षम नहीं होते।
हालांकि, कुछ डॉक्टर संगठनों ने इस फैसले पर आपत्ति भी जताई है। उनका कहना है कि डॉक्टरों की सैलरी पहले ही कम है और निजी प्रैक्टिस से उन्हें अतिरिक्त आमदनी होती थी। लेकिन सरकार का साफ कहना है कि मरीजों की सेवा सबसे ऊपर है और सरकारी सिस्टम को मजबूत करना जरूरी है।
सरकार ने यह भी संकेत दिया है कि डॉक्टरों की सैलरी, सुविधाएं और इंफ्रास्ट्रक्चर पर भी ध्यान दिया जाएगा, ताकि वे बिना निजी प्रैक्टिस के भी सम्मानजनक जीवन जी सकें। साथ ही अस्पतालों में दवाइयों, मशीनों और स्टाफ की संख्या बढ़ाने पर भी काम किया जाएगा।
कुल मिलाकर यह फैसला बिहार की स्वास्थ्य व्यवस्था के लिए एक बड़ा बदलाव माना जा रहा है। अगर इसे सही तरीके से लागू किया गया, तो सरकारी अस्पतालों की स्थिति सुधर सकती है। मरीजों को समय पर इलाज मिलेगा, भरोसा बढ़ेगा और सरकारी स्वास्थ्य सेवाएं पहले से ज्यादा मजबूत बनेंगी। जनता को उम्मीद है कि इस कदम से डॉक्टर और मरीज के बीच का रिश्ता और बेहतर होगा और बिहार में स्वास्थ्य सेवाओं की तस्वीर बदलेगी।
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