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कानून किताबों में सिमटा बचपन, ईंट-भट्ठों पर बहता पसीना सरकारी निगरानी के दावों के बीच खुलेआम फल-फूल रहा बाल श्रम

तिलौथू (रोहतास) जिले में बाल श्रम उन्मूलन को लेकर सरकारी योजनाएँ कागज़ों में जितनी मजबूत दिखती हैं, ज़मीनी हकीकत उतनी
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तिलौथू (रोहतास)
जिले में बाल श्रम उन्मूलन को लेकर सरकारी योजनाएँ कागज़ों में जितनी मजबूत दिखती हैं, ज़मीनी हकीकत उतनी ही चिंताजनक है। ईंट-भट्ठों पर मिट्टी ढोते, तेज धूप में ईंटें जमाते और ट्रैक्टर चलाते नाबालिग बच्चे यह सवाल खड़ा कर रहे हैं कि आखिर कानून किसके लिए बने हैं।
बाल श्रम निषेध एवं विनियमन अधिनियम के तहत 14 वर्ष से कम उम्र के बच्चों से श्रम कराना अपराध है, बावजूद इसके जिले के कई ईंट-भट्ठों पर बच्चे खुलेआम काम करते दिखाई दे रहे हैं। नंगे पाँव भट्ठों पर दौड़ते बच्चे और ट्रैक्टर की स्टेयरिंग थामे किशोर प्रशासनिक दावों की पोल खोल रहे हैं।
चिंताजनक बात यह है कि यह स्थिति कोई नई नहीं है। वर्षों से भट्ठा मालिक, ट्रैक्टर संचालक और स्थानीय स्तर का पूरा सिस्टम इस सच्चाई से वाकिफ है। इसके बावजूद कार्रवाई केवल कागज़ी औपचारिकताओं तक सीमित रह जाती है। बाल श्रम विभाग की कभी-कभार होने वाली छापेमारी में कुछ तस्वीरें खिंचती हैं, रिपोर्ट तैयार होती है, लेकिन कुछ ही दिनों में वही बच्चे फिर उसी जगह काम करते नज़र आते हैं।
सवाल यह नहीं है कि बाल मजदूरी हो रही है या नहीं—सवाल यह है कि जब सब कुछ सबको पता है, तो ठोस कार्रवाई क्यों नहीं होती? क्या प्रशासन किसी “फाइल के आने” का इंतज़ार कर रहा है?
जब स्कूल की जगह ईंट-भट्ठा बच्चे की दुनिया बन जाए,
जब हाथ में किताब की जगह ट्रैक्टर की स्टेयरिंग थमा दी जाए,
तो समझना होगा कि बचपन सस्ता होता जा रहा है—
और कानून सिर्फ किताबों तक सिमटते जा रहे हैं।
बाल श्रम पर सख्त कानून और योजनाओं के बावजूद ज़मीनी अमल की कमी प्रशासनिक व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े करती है। अब देखने वाली बात यह होगी कि जिम्मेदार विभाग इस हकीकत को कब गंभीरता से लेते हैं।

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