Last updated: January 6th, 2026 at 04:49 pm

दिल्ली की राजनीति में एक बार फिर दिल्ली सरकार और उपराज्यपाल (LG) के बीच तनातनी चर्चा का विषय बन गई है। दोनों के बीच मतभेद मुख्य रूप से प्रशासनिक अधिकारों और नीतिगत फैसलों को लेकर हैं। यह विवाद पिछले कई सालों से समय-समय पर सामने आता रहा है और अब हाल के दिनों में इसे लेकर फिर से राजनीतिक हलचल बढ़ गई है।
दिल्ली सरकार का कहना है कि उन्होंने राज्य में नागरिकों के हित में कई नीतिगत फैसले लिए हैं, लेकिन उपराज्यपाल ने उन पर रोक लगाई या मंजूरी देने में देरी की। सरकार का तर्क है कि संविधान के तहत दिल्ली विधानसभा और मंत्रीमंडल को ऐसे मामलों में पूरी तरह से अधिकार प्राप्त हैं। उनका यह भी कहना है कि नागरिकों की सुविधा और विकास योजनाओं को प्रभावित किए बिना निर्णय लेने का अधिकार उन्हें होना चाहिए।
दूसरी ओर उपराज्यपाल का कहना है कि केंद्र शासित प्रदेश होने के नाते कुछ प्रशासनिक और वित्तीय मामलों में LG की सहमति जरूरी है। उनका मानना है कि सरकार के निर्णयों की निगरानी करना उनकी जिम्मेदारी है और यह सुनिश्चित करना जरूरी है कि कानून और नियमों का पालन हो। LG के दावे के अनुसार, बिना उनकी मंजूरी के लिए गए फैसले संवैधानिक प्रक्रिया का उल्लंघन कर सकते हैं।
इस विवाद के कारण कई योजनाओं और प्रोजेक्टों की प्रगति प्रभावित हो रही है। कई बार सरकार ने नीतिगत योजनाओं की घोषणा की, लेकिन LG ने उन पर रोक लगाई। इससे दिल्ली में प्रशासनिक कार्यकुशलता और सरकारी योजनाओं के कार्यान्वयन में बाधा पैदा हुई है। नागरिक और मीडिया भी इस मुद्दे पर लगातार सवाल उठा रहे हैं।
राजनीतिक दल इस मामले को अपनी राजनीतिक रणनीति के हिस्से के रूप में देख रहे हैं। विपक्ष का कहना है कि यह मामला केंद्र और राज्य के बीच सत्ता संघर्ष का उदाहरण है। वहीं, सत्तारूढ़ दल इसे दिल्ली सरकार की स्वतंत्रता और नागरिक हित के लिए संघर्ष के रूप में प्रस्तुत करता है। इसके चलते मीडिया में भी इस विवाद पर बहस जारी रहती है और हर फैसले की खबर प्रमुखता से दिखाई जाती है।
विशेषज्ञों का मानना है कि दिल्ली सरकार और LG के बीच यह तनातनी केवल राजनीतिक नहीं बल्कि संवैधानिक भी है। संविधान और कानून दोनों पक्षों के अधिकारों और जिम्मेदारियों को स्पष्ट करते हैं, लेकिन व्यावहारिक स्थिति में मतभेद हमेशा बने रहते हैं। इस कारण भविष्य में भी ऐसे विवाद समय-समय पर उभरते रहेंगे।
कुल मिलाकर, दिल्ली सरकार और उपराज्यपाल के बीच चल रही तनातनी प्रशासनिक अधिकारों और नीतिगत फैसलों के संतुलन पर सवाल उठाती है। यह विवाद केवल नेताओं के बीच सीमाओं को लेकर नहीं है, बल्कि नागरिकों के जीवन और विकास योजनाओं पर भी असर डालता है। आने वाले दिनों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि दोनों पक्ष संवैधानिक और प्रशासनिक सहयोग के जरिए इस विवाद को कैसे सुलझाते हैं।
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