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डिजिटलीकरण की धीमी रफ्तार पर सरकार सख्त, दस जिलों को मिली अंतिम छह माह की मोहलत

सरकार के डिजिटल इंडिया के सपने को ज़मीनी स्तर पर उतारने में जहां कई विभाग तेज़ी से आगे बढ़े हैं,
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सरकार के डिजिटल इंडिया के सपने को ज़मीनी स्तर पर उतारने में जहां कई विभाग तेज़ी से आगे बढ़े हैं, वहीं कुछ जगहों पर काम की रफ्तार अब भी चिंता का कारण बनी हुई है। उप निबंधक कार्यालयों में पंजीकृत दस्तावेजों के डिजिटलीकरण को लेकर ऐसा ही एक मामला सामने आया है। शासन ने प्रदेश के दस जिलों को इस अहम परियोजना को पूरा करने के लिए छह महीने का अतिरिक्त समय दिया है, लेकिन इस बार चेतावनी भी साफ़ है कि लापरवाही बर्दाश्त नहीं की जाएगी।

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    किन जिलों को मिला अतिरिक्त समय

    स्टांप एवं निबंधन विभाग के प्रमुख सचिव अमित सिंह ने महानिरीक्षक निबंधन को भेजे पत्र में बताया है कि एटा, वाराणसी, मुरादाबाद, मैनपुरी, लखनऊ, अलीगढ़, हाथरस, आगरा, सहारनपुर और प्रयागराज जैसे बड़े और महत्वपूर्ण जिले अब तक तय समयसीमा में डिजिटलीकरण का कार्य पूरा नहीं कर पाए हैं। पहले ही एक साल का अतिरिक्त समय दिया जा चुका था, लेकिन उसके बावजूद काम अधूरा रह गया।

    इन सभी जिलों के उप निबंधक कार्यालयों को अब शेष पंजीकृत दस्तावेजों को डिजिटल रूप में सुरक्षित करने के लिए छह महीने का और समय दिया गया है। यह विस्तार अंतिम अवसर के तौर पर देखा जा रहा है।

    डिजिटल रिकॉर्ड क्यों है ज़रूरी

    आज के समय में भूमि और संपत्ति से जुड़े दस्तावेज केवल कागज का पुलिंदा नहीं रह गए हैं। डिजिटल रिकॉर्ड न सिर्फ़ दस्तावेजों की सुरक्षा सुनिश्चित करता है, बल्कि आम लोगों को भी बार बार कार्यालयों के चक्कर लगाने से बचाता है। डिजिटलीकरण से फर्जीवाड़े पर लगाम लगती है, रिकॉर्ड आसानी से उपलब्ध होते हैं और न्यायिक प्रक्रियाओं में भी तेजी आती है।

    शासन ने साफ़ कर दिया है कि समयसीमा भले ही बढ़ाई गई हो, लेकिन इसके लिए कोई अतिरिक्त धनराशि नहीं दी जाएगी। पहले से स्वीकृत बजट में ही यह काम पूरा करना होगा। यह निर्देश अपने आप में एक संदेश है कि अब संसाधनों की कमी नहीं, बल्कि कार्यप्रणाली की जवाबदेही पर ध्यान दिया जाएगा।

    लापरवाही पर तय होगी जिम्मेदारी

    पत्र में यह भी स्पष्ट किया गया है कि डिजिटलीकरण के दौरान किसी भी स्तर पर लापरवाही नहीं होनी चाहिए। यदि निर्धारित छह माह में काम पूरा नहीं होता है, तो हर स्तर पर जिम्मेदारी तय की जाएगी। इसका मतलब यह है कि अब केवल समय बढ़ाने से काम नहीं चलेगा, बल्कि अधिकारियों और कर्मचारियों को परिणाम दिखाने होंगे।

    जनता की उम्मीदें और सिस्टम की परीक्षा

    इन जिलों में हर दिन सैकड़ों लोग जमीन, मकान और अन्य संपत्तियों से जुड़े कार्यों के लिए उप निबंधक कार्यालयों का रुख करते हैं। डिजिटलीकरण की धीमी गति सीधे तौर पर आम आदमी की परेशानी बढ़ाती है। ऐसे में यह छह महीने न केवल प्रशासन के लिए, बल्कि पूरे सिस्टम की कार्यक्षमता की परीक्षा हैं।अगर तय समय में काम पूरा हो जाता है, तो यह डिजिटल प्रशासन की दिशा में एक मजबूत कदम होगा। लेकिन अगर फिर देरी हुई, तो सवाल सिर्फ़ परियोजना पर नहीं, बल्कि जवाबदेही और सुशासन की प्रतिबद्धता पर भी उठेंगे।

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