
उत्तर प्रदेश के गोंडा में चल रहे राष्ट्र कथा महोत्सव के दूसरे दिन एक ऐसा भावुक दृश्य सामने आया, जिसने पूरे पंडाल को स्तब्ध कर दिया। मंच पर मौजूद पूर्व सांसद बृजभूषण शरण सिंह उस वक्त अपनी भावनाओं पर काबू नहीं रख सके, जब सद्गुरु ऋतेश्वर महाराज ने बच्चों को राष्ट्र के नाम संदेश देते हुए उनका उल्लेख किया। महाराज के शब्द इतने गहरे और सीधे दिल तक उतरने वाले थे कि बृजभूषण शरण सिंह मंच पर ही फूट-फूट कर रो पड़े।
‘दबदबा था, है और रहेगा’ ने बदला माहौल
सद्गुरु ऋतेश्वर महाराज बच्चों को समझा रहे थे कि समाज और राष्ट्र में प्रभाव केवल पद से नहीं, बल्कि व्यक्तित्व और कर्म से बनता है। इसी क्रम में उन्होंने कहा, “जब इस अवध क्षेत्र में, उत्तर प्रदेश में, भारत में गोंडा का नाम लेते हो और कहते हो कि दबदबा था, दबदबा है और दबदबा रहेगा, तो यहां उसका प्रतीक बैठा है।” यह सुनते ही बृजभूषण शरण सिंह भावुक हो गए। उनकी आंखों से आंसू बहने लगे और करीब एक घंटे तक वे खुद को संभाल नहीं पाए।
राष्ट्र कथा: मनोरंजन नहीं, मन का मंथन
राष्ट्र कथा महोत्सव के दौरान ऋतेश्वर महाराज ने श्रद्धालुओं को यह समझाया कि कथा केवल सुनने या समय बिताने का माध्यम नहीं होती। उन्होंने कहा कि सच्ची कथा चेतना को जागृत करती है और भीतर छिपी ऊर्जा को ऊपर उठाती है। “जौहरी ही पत्थर की पहचान करता है,” इस उदाहरण के साथ उन्होंने अज्ञानता से होने वाले जीवन के नुकसान की ओर भी ध्यान दिलाया।
संस्कारों से बचता है देश
महाराज ने वर्तमान शिक्षा व्यवस्था और सामाजिक सोच पर भी सवाल उठाए। उन्होंने साफ कहा कि देश झंडे और डंडों से नहीं, बल्कि संस्कारों से सुरक्षित रहता है। देवताओं की पूजा के साथ उनके आदर्शों को जीवन में उतारने की बात करते हुए उन्होंने कहा कि हमने ज्ञान और प्रज्ञा को केवल कर्मकांडों तक सीमित कर दिया है, जबकि सनातन परंपरा जीवन जीने की कला सिखाती है।
युवाओं में राष्ट्र चेतना का आह्वान
कथा महोत्सव के तीसरे दिन सद्गुरु ऋतेश्वर महाराज ने युवाओं को विशेष संदेश दिया। उन्होंने कहा कि सनातन धर्म का मूल ही राष्ट्र की चिंता करना है। भारत की संस्कृति केवल रीति-रिवाज नहीं, बल्कि मानवता, आनंद और कर्तव्य की शिक्षा देती है। उन्होंने राम, सीता और लक्ष्मण के वन-गमन का उदाहरण देते हुए त्याग और राष्ट्र-प्रेम को समझाया।
राष्ट्र निर्माण की सबसे बड़ी ताकत युवा
महाराज ने कहा कि यदि युवा पीढ़ी आनंदित, ऊर्जावान और जागरूक होगी, तो राष्ट्र अपने आप सशक्त बन जाएगा। पांच इंद्रियों के पीछे भागने की बजाय भीतर के आनंद को पहचानने का संदेश देते हुए उन्होंने राष्ट्र कथा महोत्सव के उद्देश्य को स्पष्ट किया।
गोंडा की इस राष्ट्र कथा ने न केवल आध्यात्मिक चेतना जगाई, बल्कि यह भी दिखा दिया कि शब्दों की शक्ति कभी-कभी सबसे मजबूत व्यक्तित्व को भी भावुक कर देती है।
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