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IGIMS पेपर लीक विवाद: मेडिकल परीक्षा में गड़बड़ी के आरोप, जांच के घेरे में पूरा सिस्टम

पटना स्थित इंदिरा गांधी आयुर्विज्ञान संस्थान एक बार फिर गंभीर विवादों में घिर गया है। इस बार मामला मेडिकल परीक्षाओं
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पटना स्थित इंदिरा गांधी आयुर्विज्ञान संस्थान एक बार फिर गंभीर विवादों में घिर गया है। इस बार मामला मेडिकल परीक्षाओं में कथित अनियमितताओं और पेपर लीक से जुड़ा है, जिसने पूरे शिक्षा तंत्र पर सवाल खड़े कर दिए हैं।

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    आरोप है कि एमबीबीएस और पीजी फाइनल ईयर की परीक्षाओं में बड़े स्तर पर गड़बड़ी हुई है। पेपर लीक, कॉपियों में छेड़छाड़ और पैसों के लेन-देन जैसी बातों ने इस मामले को और गंभीर बना दिया है।

    इस बीच संस्थान के निदेशक डॉ. बिंदे का अचानक छुट्टी पर जाना भी कई सवाल खड़े कर रहा है। बताया जा रहा है कि वे बिहार राज्य स्वास्थ्य एवं विज्ञान विश्वविद्यालय में अस्थायी कुलपति की जिम्मेदारी भी संभाल रहे हैं और स्थायी पद को लेकर उनकी सक्रियता चर्चा में है।

    पूरा मामला एक गुमनाम ईमेल से सामने आया, जिसमें 13 मार्च को ही परीक्षा से जुड़ी गड़बड़ियों का खुलासा किया गया था। हालांकि, शुरुआती दिनों में इस पर कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई। मामला तूल पकड़ने के बाद प्रशासन ने जांच के लिए चार सदस्यीय कमेटी गठित की।

    यह जांच कमेटी डॉ. ओम कुमार की अगुवाई में बनाई गई है, जिसमें डॉ. संजय कुमार, डॉ. ज्ञान भाष्कर और डॉ. अश्विनी शामिल हैं। कमेटी को सात कार्य दिवस के भीतर अपनी रिपोर्ट सौंपने का निर्देश दिया गया है।

    हालांकि, इस जांच को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। संस्थान के प्रिंसिपल डॉ. रंजीत गुहा को जांच से बाहर रखा गया है, जबकि मामला सीधे उनके अधिकार क्षेत्र से जुड़ा बताया जा रहा है। उन्होंने इस पर आपत्ति जताते हुए जांच की पारदर्शिता पर सवाल उठाए हैं।

    सूत्रों के अनुसार, इस कथित घोटाले में अलग-अलग तरह की गड़बड़ियों के लिए तय रकम ली जा रही थी। पेपर लीक से लेकर कॉपियों को बाहर से लिखवाने तक के आरोप सामने आए हैं। यह भी कहा जा रहा है कि कुछ उत्तर पुस्तिकाओं में बाहरी हस्तक्षेप कर उन्हें सिस्टम में शामिल किया गया।

    इसके अलावा, परीक्षा शाखा के सीसीटीवी फुटेज में संदिग्ध गतिविधियों के संकेत मिलने की भी चर्चा है। असामान्य समय पर लोगों की आवाजाही और बंद कमरों में गतिविधियां इस पूरे मामले को और गंभीर बनाती हैं, हालांकि इन दावों की आधिकारिक पुष्टि अभी नहीं हुई है।

    इससे पहले भी प्रारंभिक जांच में कुछ अनियमितताओं के संकेत मिले थे, लेकिन उस समय मामला दबा दिया गया था। अब जब मामला खुलकर सामने आया है, तो सिर्फ IGIMS ही नहीं, बल्कि पूरे मेडिकल एजुकेशन सिस्टम की विश्वसनीयता पर सवाल उठ रहे हैं।

    अब सबकी नजर जांच कमेटी की रिपोर्ट पर टिकी है। अगर आरोप साबित होते हैं, तो यह मामला बिहार के मेडिकल शिक्षा तंत्र के लिए बड़ा झटका साबित हो सकता है।

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