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बांकीपुर उपचुनाव से पहले जन सुराज को झटका, प्रो. केसी सिन्हा समेत कई नेताओं ने थामा बीजेपी का दामन

बांकीपुर विधानसभा उपचुनाव से पहले बिहार की राजनीति में बड़ा घटनाक्रम सामने आया है। जन सुराज पार्टी के कई वरिष्ठ
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बांकीपुर विधानसभा उपचुनाव से पहले बिहार की राजनीति में बड़ा घटनाक्रम सामने आया है। जन सुराज पार्टी के कई वरिष्ठ नेताओं ने भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की सदस्यता ग्रहण कर ली। भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष संजय सरावगी ने सभी नेताओं को पार्टी की सदस्यता दिलाई।

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    इन नेताओं ने छोड़ा जन सुराज का साथ

    भाजपा में शामिल होने वालों में प्रसिद्ध गणितविद् एवं शिक्षाविद् प्रो. केसी सिन्हा, दीघा विधानसभा क्षेत्र से पूर्व प्रत्याशी बिट्टू सिंह और मनेर विधानसभा क्षेत्र से पूर्व प्रत्याशी गोपाल सिंह शामिल हैं। इन नेताओं के भाजपा में शामिल होने से उपचुनाव के बीच सियासी हलचल तेज हो गई है।

    जन सुराज के लिए बढ़ी राजनीतिक चुनौती

    राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि चुनावी माहौल के बीच वरिष्ठ नेताओं का पार्टी छोड़ना जन सुराज के लिए संगठनात्मक और राजनीतिक दोनों स्तर पर बड़ा झटका माना जा रहा है। ऐसे समय में यह घटनाक्रम पार्टी की चुनावी रणनीति और कार्यकर्ताओं के मनोबल पर असर डाल सकता है।

    शिक्षा जगत में बड़ी पहचान रखते हैं प्रो. केसी सिन्हा

    प्रो. केसी सिन्हा गणित शिक्षा के क्षेत्र में देशभर में अपनी अलग पहचान रखते हैं। उन्होंने बीएससी और एमएससी में स्वर्ण पदक हासिल किया और लंबे समय तक पटना साइंस कॉलेज में गणित के प्रोफेसर रहे। इसके अलावा उन्होंने गणित विषय पर 70 से अधिक पुस्तकें लिखी हैं, जो प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने वाले छात्रों के बीच काफी लोकप्रिय हैं।

    2025 में जन सुराज से लड़ा था चुनाव

    प्रो. केसी सिन्हा ने वर्ष 2025 में प्रशांत किशोर की जन सुराज पार्टी जॉइन की थी और कुम्हरार विधानसभा सीट से चुनाव लड़ा था। हालांकि, चुनाव में उन्हें जीत नहीं मिली और वे तीसरे स्थान पर रहे। अब भाजपा में शामिल होने के बाद उनके इस फैसले को बिहार की बदलती राजनीतिक रणनीति से जोड़कर देखा जा रहा है।

    उपचुनाव में बढ़े सियासी मायने

    बांकीपुर उपचुनाव के दौरान जन सुराज के प्रमुख चेहरों का भाजपा में शामिल होना राजनीतिक रूप से अहम माना जा रहा है। माना जा रहा है कि इससे भाजपा को चुनावी बढ़त मिल सकती है, जबकि जन सुराज के सामने संगठन को मजबूत बनाए रखने की चुनौती और बढ़ गई है।

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