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जनसुराज में टिकट बंटवारे पर मचा बवाल : नेहा नटराज और रितेश पांडे को मिला मौका, आरसीपी सिंह की बेटी पर उठा विरोध – अंदरूनी जातीय समीकरणों पर उठे सवाल

चेनारी/करगहर/पटना : जनसुराज पार्टी में टिकट बंटवारे को लेकर राजनीतिक हलचल तेज हो गई है। चेनारी (रिजर्व) सीट से नेहा
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चेनारी/करगहर/पटना :

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    जनसुराज पार्टी में टिकट बंटवारे को लेकर राजनीतिक हलचल तेज हो गई है। चेनारी (रिजर्व) सीट से नेहा नटराज और करगहर से लोकप्रिय गायक रितेश पांडे को टिकट मिलने के बाद समर्थकों में खुशी की लहर दौड़ गई। वहीं, आरसीपी सिंह की बेटी को टिकट मिलने पर पार्टी के अंदर विरोध शुरू हो गया है। कई कार्यकर्ताओं ने टिकट बदलने की मांग उठाई है। टिकट वितरण के तुरंत बाद जनसुराज कार्यालयों में हंगामे की स्थिति बन गई।

     

    राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि प्रशांत किशोर ने बिहार के जातीय और सामाजिक समीकरणों को ध्यान में रखते हुए ऐसे उम्मीदवारों को टिकट दिया है जो आर्थिक रूप से सक्षम हों और पूरे दमखम के साथ चुनाव लड़ सकें। उनका कहना है कि पीके ने रणनीति के तहत जातीय विविधता और संसाधन क्षमता दोनों को संतुलित करने की कोशिश की है।

     

    लेकिन, इसी बीच बालियापुर–मसरख की पूर्व जिला पार्षद ने एक निजी न्यूज चैनल से बात करते हुए प्रशांत किशोर पर अंदरूनी जातिवाद का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि “मैं शुरू से पार्टी में जुड़ी रही, दिन-रात मेहनत की, लेकिन टिकट अपने ही जात के लोगों को दे दिया गया। जिलाध्यक्ष से लेकर प्रमुख पदों तक सब जगह एक ही जात का वर्चस्व है। सिर्फ वोट के वक्त जय बिहार-जय बिहार की बातें की जाती हैं।”

     

    कई सामाजिक कार्यकर्ताओं ने भी आरोप लगाया है कि प्रशांत किशोर ने अचानक भाजपा नेता मंगल पांडे से सुलह कर ली और ओबीसी नेता सम्राट चौधरी व दलित नेता अशोक चौधरी पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाकर ओबीसी-दलित नेतृत्व को कमजोर करने की कोशिश की।

     

    इधर, बिहार की राजनीति में भी हलचल जारी है। जदयू के वरिष्ठ नेता और पूर्व मंत्री लक्षमेश्वर राय ने पार्टी छोड़कर राजद का दामन थाम लिया है। वहीं, लोजपा (रामविलास) के प्रदेश प्रवक्ता सह प्रभारी औरंगाबाद निवासी कुमार सौरभ सिंह ने भी पार्टी की प्राथमिक सदस्यता से इस्तीफा दे दिया है।

    राजनीतिक गलियारों में उठता सवाल:

    हर पार्टी आखिर अमीरों को ही टिकट क्यों देती है? क्या किसी तेज-तर्रार ट्यूशन शिक्षक, समाजसेवी, या संघर्षशील किराना दुकानदार को टिकट देकर राजनीति में नई मिसाल नहीं बनाई जा सकती? क्यों नहीं ऐसे व्यक्ति को टिकट दिया जाता जिसकी जाति उस क्षेत्र में अल्पसंख्यक हो — ताकि असली लोकतंत्र और सामाजिक समानता का संदेश दिया जा सके?

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