Human Live Media

HomeNewsजेएनयू में नारेबाजी पर सियासी घमासान, राजनीति के केंद्र में विश्वविद्यालय

जेएनयू में नारेबाजी पर सियासी घमासान, राजनीति के केंद्र में विश्वविद्यालय

जेएनयू में राजनीति-संबंधी विवाद और नारेबाजी: सियासी बहस का केंद्र बना कैंपस दिल्ली के जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) और जामिया
jnu_650x400_41518829867

जेएनयू में राजनीति-संबंधी विवाद और नारेबाजी: सियासी बहस का केंद्र बना कैंपस

दिल्ली के जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) और जामिया मिलिया इस्लामिया जैसे शिक्षण संस्थान एक बार फिर राजनीति से जुड़े विवादों को लेकर चर्चा में हैं। हाल के दिनों में कुछ छात्रों द्वारा की गई नारेबाजी को लेकर देशभर में सियासी बहस तेज हो गई है। इस मुद्दे पर राजनीतिक दलों, छात्र संगठनों और आम जनता की अलग-अलग प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं।

कहा जा रहा है कि कैंपस में हुई नारेबाजी को कुछ लोग अभिव्यक्ति की आज़ादी से जोड़कर देख रहे हैं, जबकि अन्य इसे देश और समाज के खिलाफ बताते हुए कड़ी कार्रवाई की मांग कर रहे हैं। इसी वजह से यह मामला अब केवल विश्वविद्यालय तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि राष्ट्रीय राजनीति का हिस्सा बन गया है।

सत्तारूढ़ दल के नेताओं का कहना है कि विश्वविद्यालय पढ़ाई और शोध के लिए होते हैं, न कि ऐसी गतिविधियों के लिए जो समाज में तनाव पैदा करें। उनका मानना है कि छात्रों को अपनी सीमाओं में रहकर अपनी बात रखनी चाहिए और कानून-व्यवस्था को चुनौती देने वाली गतिविधियों से बचना चाहिए। कुछ नेताओं ने यह भी कहा कि अगर कोई कानून तोड़ता है, तो उसके खिलाफ कार्रवाई होनी चाहिए, चाहे वह छात्र ही क्यों न हो।

वहीं विपक्षी दल इस मुद्दे पर सरकार को घेर रहे हैं। उनका कहना है कि छात्रों की आवाज को दबाने की कोशिश की जा रही है और असहमति को देशद्रोह से जोड़ना गलत है। विपक्ष का तर्क है कि विश्वविद्यालय हमेशा से विचारों के आदान-प्रदान का केंद्र रहे हैं और यहां सवाल उठाना लोकतंत्र की मजबूती का संकेत है।

छात्र संगठनों के बीच भी इस मुद्दे को लेकर मतभेद साफ नजर आ रहे हैं। कुछ छात्र संगठनों ने नारेबाजी का समर्थन करते हुए इसे छात्रों के अधिकारों से जोड़ा है, जबकि कुछ अन्य संगठनों ने इसे गैर-जिम्मेदाराना बताया है। उनका कहना है कि इस तरह की गतिविधियों से विश्वविद्यालय की छवि खराब होती है और पढ़ाई का माहौल प्रभावित होता है।

इस विवाद के बाद प्रशासन भी सतर्क हो गया है। विश्वविद्यालय प्रशासन ने कहा है कि कैंपस में शांति बनाए रखना उनकी प्राथमिकता है और किसी भी तरह की अनुशासनहीनता को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। जरूरत पड़ने पर जांच कमेटी बनाने और नियमों के तहत कार्रवाई करने की बात भी कही गई है।

राजनीतिक जानकारों का मानना है कि जेएनयू और जामिया जैसे विश्वविद्यालय अक्सर राजनीतिक बहस के केंद्र में रहते हैं। हर बार जब यहां कोई विवाद होता है, तो वह सीधे राष्ट्रीय राजनीति से जुड़ जाता है। इससे साफ है कि शिक्षा और राजनीति के बीच की रेखा कई बार धुंधली हो जाती है।

कुल मिलाकर, जेएनयू में नारेबाजी और उससे जुड़े विवाद ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि विश्वविद्यालयों में राजनीति की सीमा क्या होनी चाहिए। यह बहस आने वाले दिनों में और तेज हो सकती है, क्योंकि सभी पक्ष अपने-अपने तर्कों के साथ इस मुद्दे पर डटे हुए हैं।

Loading

Comments are off for this post.