Last updated: January 21st, 2026 at 09:40 am

पिछले कुछ दिनों से अंतरराष्ट्रीय राजनीति के गलियारों में एक अजीब बेचैनी महसूस की जा रही है। ढाका के शेरेटन होटल में देर रात हुई एक हत्या की खबर ने अचानक कई देशों को चौकन्ना कर दिया। सोशल मीडिया और राजनीतिक चर्चाओं में इसे पाकिस्तानी आईएसआई एजेंट की हत्या बताया जा रहा है। इससे पहले एक कथित सीआईए एजेंट की मौत की चर्चाएं भी सामने आई थीं। सच क्या है, झूठ क्या—यह अब भी साफ नहीं है, लेकिन सवाल बहुत गहरे हैं।
ढाका बना नया केंद्र?
कभी ऐसी रहस्यमयी गतिविधियों का केंद्र काठमांडू को माना जाता था, लेकिन अब चर्चा ढाका पर आ टिक गई है। लगातार यह दावा किया जा रहा है कि भारत-विरोधी ताकतों से जुड़े लोग बांग्लादेश में निशाना बन रहे हैं। इससे यह धारणा मजबूत हो रही है कि क्षेत्रीय शक्ति-संतुलन बदल रहा है और इसके पीछे बड़े अंतरराष्ट्रीय हित काम कर रहे हैं।
मोदी की सुरक्षा और कूटनीतिक संकेत
इन घटनाओं के बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का खुद आसियान शिखर सम्मेलन में न जाकर विदेश मंत्री एस. जयशंकर को भेजना कई तरह की अटकलों को जन्म देता है। समर्थक इसे एक रणनीतिक कदम मानते हैं, जबकि आलोचक इसे सुरक्षा कारणों से जोड़कर देखते हैं। इसी समय राहुल गांधी का मलेशिया दौरा भी राजनीतिक बहस को और तेज करता है। क्या यह महज संयोग है या किसी बड़ी कहानी का हिस्सा?
अमेरिका की भूमिका पर सवाल
सबसे विवादित पहलू अमेरिकी एजेंसियों को लेकर है। अमेरिकी सरकार ने कथित सीआईए एजेंट की हत्या की खबर को अफवाह बताया है और कहा है कि उनका अधिकारी सुरक्षित अमेरिका में है। वहीं, ढाका के होटल स्टाफ के हवाले से यह दावा किया जा रहा है कि अमेरिकी अधिकारियों ने शव को अपने कब्जे में लिया और स्थानीय पोस्टमार्टम की अनुमति नहीं दी। सच चाहे जो हो, भरोसे की कमी साफ झलकती है।
वैश्विक शक्ति-संतुलन की जंग
दिसंबर में पुतिन और नेतन्याहू के भारत दौरे की चर्चाएं हैं। वहीं, ट्रंप से मुलाकात को लेकर दूरी की बातें भी सामने आ रही हैं। रुपये को डॉलर के मुकाबले मजबूत करने की भारत की कोशिशें वैश्विक अर्थव्यवस्था में नई लकीर खींच रही हैं। ऐसे में अमेरिका, रूस और भारत के रिश्तों की बारीकियां और भी अहम हो जाती हैं।
2027 की राजनीति और बढ़ती आशंकाएं
2027 का चुनाव विपक्ष के लिए अस्तित्व की लड़ाई माना जा रहा है। लेकिन जब राजनीतिक भाषा में “जीने-मरने” की जगह “मारने” जैसे शब्द आने लगें, तो चिंता स्वाभाविक है। लोकतंत्र सवाल पूछने की आज़ादी देता है, पर हिंसा की आशंका समाज को भीतर से खोखला कर देती है।
यह लेख किसी निष्कर्ष का दावा नहीं करता। यह सिर्फ उन सवालों को सामने रखता है जो आज हर जागरूक नागरिक के मन में हैं। सच की तलाश जरूरी है, लेकिन उससे भी जरूरी है मानवता, संयम और लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा। जब तक पूरी तस्वीर साफ न हो, तब तक अफवाहों से नहीं, विवेक से काम लेना ही सबसे बड़ा राष्ट्रधर्म है।
![]()
Comments are off for this post.