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NEET छात्रा रेप-मौत केस: जब 22 दिन की जांच भी सच तक नहीं पहुंच सकी

NEET की तैयारी कर रही एक छात्रा की रेप के बाद मौत ने पूरे बिहार को झकझोर कर रख दिया
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NEET की तैयारी कर रही एक छात्रा की रेप के बाद मौत ने पूरे बिहार को झकझोर कर रख दिया है। 22 दिन तक चली SIT की जांच, कई दावे, बदलती थ्योरी और अधूरी रिपोर्टों के बाद अब आखिरकार मामला CBI को सौंप दिया गया है। यह फैसला सिर्फ एक प्रशासनिक कदम नहीं, बल्कि उस सिस्टम पर उठते सवालों का नतीजा है, जिस पर भरोसा लगातार कमजोर होता गया।

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    जब SIT 22 दिन में भी तस्वीर साफ नहीं कर पाई

    किसी भी गंभीर अपराध में शुरुआती कुछ दिन सबसे अहम होते हैं। लेकिन इस केस में 22 दिन बीतने के बाद भी SIT यह तय नहीं कर पाई कि मौत की असली वजह क्या है। पहले आत्महत्या की बात सामने आई, फिर संदिग्ध मौत और बाद में रेप की पुष्टि हुई। इस उलझन ने न सिर्फ जांच की दिशा को कमजोर किया, बल्कि परिवार के दर्द को और गहरा कर दिया।

    DNA जांच को सबसे मजबूत कड़ी माना जा रहा था, लेकिन 18 लोगों के सैंपल फेल हो गए। इससे सवाल उठे कि क्या सही संदिग्धों तक पहुंच ही नहीं बन पाई या फिर सबूत जुटाने में शुरुआती स्तर पर लापरवाही हुई।

    एम्स रिपोर्ट का इंतजार और उससे पहले केस ट्रांसफर

    पूरा मामला मेडिकल राय पर टिका हुआ था। एम्स से मिलने वाली विशेषज्ञ रिपोर्ट से मौत का कारण, चोटों की प्रकृति और यौन हिंसा की पुष्टि होनी थी। लेकिन रिपोर्ट आने से पहले ही केस CBI को सौंप दिया गया। यह जल्दबाजी सरकार के फैसले पर सवाल खड़े करती है और SIT की तैयारी पर भी।

    सीन ऑफ क्राइम से जुड़ी चूक

    परिवार का आरोप है कि FIR दर्ज करने में देरी हुई और हॉस्टल का कमरा समय पर सील नहीं किया गया। CCTV और DVR की जांच भी देर से हुई। इन चूकों ने सबूतों को कमजोर किया। पोस्टमॉर्टम में संघर्ष और चोटों के संकेत मिले, लेकिन शुरुआती दिनों में इन्हें गंभीरता से नहीं लिया गया।

    परिवार का भरोसा क्यों टूटा

    पीड़ित परिवार का कहना है कि उन पर आत्महत्या मानने का दबाव बनाया गया और बार बार पूछताछ से मानसिक दबाव बढ़ा। जब पीड़ित पक्ष खुद असुरक्षित महसूस करने लगे, तो जांच की निष्पक्षता पर सवाल उठना स्वाभाविक है।

    CBI के सामने अब क्या चुनौती है

    CBI को अब समय से जूझना होगा। कई हफ्तों की देरी से डिजिटल और फिजिकल सबूत कमजोर हो चुके हैं। गवाहों के बयान बदल सकते हैं और डेटा ओवरराइट होने की आशंका है। इसके साथ ही CBI को SIT की कमियों के बावजूद एक मजबूत और वैज्ञानिक केस खड़ा करना होगा।

    सबसे बड़ी चुनौती परिवार और गवाहों का भरोसा जीतना होगी। बिना विश्वास के कोई भी सच सामने नहीं आता। मेडिकल रिपोर्टों, CCTV फुटेज, कॉल डिटेल और मोबाइल डेटा को एक ही टाइमलाइन में जोड़ना भी बेहद संवेदनशील काम होगा।

    न्याय सिर्फ होना नहीं चाहिए, दिखना भी चाहिए

    इस केस ने एक बार फिर साबित किया है कि जब जांच पर भरोसा टूटता है, तो सियासत और आक्रोश दोनों बढ़ते हैं। CBI को दी गई जिम्मेदारी सिर्फ अपराधी तक पहुंचने की नहीं, बल्कि उस भरोसे को वापस लाने की भी है, जो इस पूरे मामले में कहीं खो गया।

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